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स्वतंत्र कोर्ट की मांग पकड़ रही जोर

– वरिष्ठ नागरिकों को न्याय के लिए नहीं चाहिए तारीख

नागपुर :- भागदौड़ भरी जिंदगी और बदलते सामाजिक ढांचे के इस दौर में वरिष्ठ नागरिकसबसे उपेक्षित वर्ग बनते जा रहे हैं. सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले लाभों, संपत्ति ज़ब्ती, पारिवारिक उत्पीडऩ और धोखाधड़ी से जुड़े मामलों में फंसे वरिष्ठ नागरिकों को मौजूदा न्यायिक व्यवस्था में वर्षों तक संघर्ष करना पड़ता है. इसी पृष्ठभूमि में वरिष्ठ नागरिक संगठनों की ओर से एक स्वतंत्र वरिष्ठ नागरिक न्यायालय की स्थापना की मांग उठ रही है ताकि वरिष्ठ नागरिकों की समस्याओं का तुरंत समाधान किया जा सकता है.

वर्तमान में, वरिष्ठ नागरिकों के मामले नियमित दीवानी या आपराधिक अदालतों में सुने जाते हैं. वहां पहले से ही लाखों मामले लंबित होने के कारण, 8० वर्ष की आयु में न्याय की मांग करने वाले व्यक्ति को अक्सर फैसला सुनाए जाने तक शारीरिक और मानसिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ता है. कई मामलों में, दुर्भाग्यपूर्ण घटनाएं भी हुई हैं जहां फैसला सुनाए जाने से पहले ही आवेदक की मृत्यु हो जाती है. वरिष्ठ नागरिकों के पास समय की कमी होती है. स्वतंत्र अदालतों के होने से उनके मामलों का निपटारा एक महीने के भीतर हो सकता है. वरिष्ठ नागरिक भीड़भाड़, अव्यवस्था और लंबी कतारें बर्दाश्त नहीं की जातीं. एक अलग अदालत में उनके लिए अनुकूल वातावरण और सुविधाएं हो सकती हैं. माता-पिता और वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2००7 के तहत कई प्रावधान हैं, लेकिन उनका कार्यान्वयन धीमा है. विशेष अदालत इस अधिनियम को और अधिक मजबूती प्रदान करेगी. साइबर अपराध और संपत्ति हड़पने के मामलों में वरिष्ठ नागरिकों को निशाना बनाने के मामले बढ़ गए हैं. ऐसे तकनीकी मामलों को संभालने के लिए एक अलग बेंच की आवश्यकता है.

न्याय ही नहीं, बल्कि यह उनके जीवनकाल में ही मिलना चाहिए. वर्तमान न्यायिक प्रक्रिया उनके स्वास्थ्य और मानसिक स्वास्थ्य के लिए एक दु:स्वप्न है. आय वैश्य वरिष्ठ नागरिक बोर्ड के सुरेश तनौरवार ने कहा कि पीओसीएसओ परिवार न्यायालयों की तरह ही धनी वरिष्ठ नागरिकों के लिए विशेष न्यायालय समय की आवश्यकता हैं.

स्वतंत्र न्यायालयों में अपेक्षित सुविधाओं का वीडियो

नगर निगम ने इस बात पर भी ध्यान दिलाया है कि वरिष्ठ नागरिकों को कॉन्फें्रसिंग के माध्यम से दूर से गवाही देने की सुविधा दी जानी चाहिए. उनके लिए वकीलों के बिना अपना पक्ष रखने की सुगम व्यवस्था होनी चाहिए और पारिवारिक विवादों में मध्यस्थता और समाधान के लिए व्यवस्था होनी चाहिए

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