– डॉ. गौरव मिश्रा को इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी में तीसरी पीएच.डी.
नागपुर/वर्धा :- चिकित्सा शिक्षा और अनुसंधान के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान देने वाले डॉ. गौरव मिश्रा ने एक और महत्वपूर्ण शैक्षणिक उपलब्धि हासिल की है। अदाणी इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च (पूर्व में दत्ता मेघे इंस्टीट्यूट ऑफ हायर एजुकेशन एंड रिसर्च), वर्धा में 17 अक्टूबर 2026 को आयोजित 17वें दीक्षांत समारोह में उन्हें इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी के विशेष क्षेत्र में तीसरी पीएच.डी. की उपाधि प्रदान की गई। इस उपलब्धि को और भी भावुक एवं यादगार बनाने वाली बात यह रही कि उन्हें यह उपाधि अपने ही पिता डॉ. वेदप्रकाश मिश्रा के हाथों प्राप्त करने का गौरव मिला।
वर्धा स्थित दत्ता मेघे ऑडिटोरियम में आयोजित इस दीक्षांत समारोह में विश्वविद्यालय के माननीय कुलपति डॉ. ललितभूषण वाघमारे, कुलसचिव डॉ. श्वेता काले पिसुलकर, कार्यकारी निदेशक (अकादमिक) डॉ. तृप्ति वाघमारे सहित अनेक गणमान्य अतिथि उपस्थित थे। इन प्रतिष्ठित शिक्षाविदों की उपस्थिति में डॉ. गौरव मिश्रा की शैक्षणिक उपलब्धि का सम्मान किया गया।
तीन पीएच.डी., शोध और ज्ञान-साधना का असाधारण सफर
डॉ. गौरव मिश्रा जवाहरलाल नेहरू मेडिकल कॉलेज, सावंगी (मेघे), वर्धा के रेडियोडायग्नोसिस विभाग में प्राध्यापक के रूप में कार्यरत हैं। इससे पहले उन्होंने वर्ष 2018 में रेडियोडायग्नोसिस तथा वर्ष 2022 में हेल्थ प्रोफेशंस एजुकेशन में पीएच.डी. की उपाधि प्राप्त की थी। अब इंटरवेंशनल रेडियोलॉजी में तीसरी पीएच.डी. हासिल कर उन्होंने अपने शैक्षणिक सफर में एक और उल्लेखनीय अध्याय जोड़ा है।
एम.डी. (रेडियोडायग्नोसिस) की स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त करने के बाद भी उन्होंने अपनी ज्ञान-साधना जारी रखी। उनके पास हेल्थ प्रोफेशंस एजुकेशन में एम.फिल. की उपाधि भी है। इसके अलावा, उन्होंने पाठ्यक्रम निर्माण, मूल्यांकन, कार्यक्रम मूल्यांकन और जैवनीति जैसे विषयों में फेलोशिप प्राप्त की हैं।
एक समर्पित शोधकर्ता और लेखक के रूप में डॉ. मिश्रा के 350 से अधिक शोधपत्र सहकर्मी-समीक्षित एवं अनुक्रमित वैज्ञानिक शोध पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। उन्होंने 14 पुस्तकों का लेखन भी किया है। चिकित्सा शिक्षा, अनुसंधान और ज्ञान के प्रसार के प्रति उनकी प्रतिबद्धता उनके इस व्यापक योगदान में स्पष्ट दिखाई देती है।
महज 33 वर्ष की उम्र में बने प्र-कुलपति
डॉ. गौरव मिश्रा की शैक्षणिक यात्रा का एक और उल्लेखनीय पड़ाव वह है, जब महज 33 वर्ष की आयु में उन्हें एक स्वास्थ्य विज्ञान विश्वविद्यालय के प्र-कुलपति पद पर नियुक्त किया गया। इतनी कम उम्र में यह महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलना उनकी शैक्षणिक योग्यता, नेतृत्व क्षमता और प्रशासनिक दक्षता को दर्शाता है।
शैक्षणिक एवं अनुसंधान क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए उन्हें इंटरनेशनल इंस्टीट्यूट ऑफ ऑर्गनाइजेशनल साइकोलॉजिकल मेडिसिन की मानद अंतरराष्ट्रीय फेलोशिप (FIIOPM) से भी सम्मानित किया गया। अमेरिका, ब्रिटेन, ऑस्ट्रेलिया और भारत से जुड़े इस संस्थान की ओर से उन्हें यह सम्मान नई दिल्ली में आयोजित एक समारोह में प्रदान किया गया। इसी समारोह में राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग के अध्यक्ष डॉ. अभिजात शेठ को भी सम्मानित किया गया था।
*माता-पिता के लिए गर्व और भावनाओं से भरा पल
डॉ. गौरव मिश्रा, कृष्णा विश्व विद्यापीठ, कराड की कुलपति डॉ. नीलम मिश्रा तथा नागपुर स्थित लता मंगेशकर विश्वविद्यालय के मुख्य सलाहकार डॉ. वेदप्रकाश मिश्रा के सुपुत्र हैं। शिक्षा और चिकित्सा क्षेत्र से गहराई से जुड़े परिवार में पले-बढ़े डॉ. गौरव ने अपनी मेहनत, शोध और निरंतर ज्ञानार्जन के बल पर अलग पहचान बनाई है।
हर माता-पिता के लिए अपनी संतान की सफलता अपार खुशी का अवसर होती है। लेकिन जब पिता को ही अपने बेटे को डॉक्टरेट की उपाधि प्रदान करने का अवसर मिले, तो वह क्षण केवल शैक्षणिक उपलब्धि तक सीमित नहीं रहता, बल्कि जीवनभर संजोकर रखने वाली भावनात्मक स्मृति बन जाता है।
डॉ. गौरव मिश्रा की तीसरी पीएच.डी. की उपलब्धि उनके व्यक्तिगत परिश्रम और प्रतिभा का सम्मान तो है ही, साथ ही यह माता-पिता के संस्कारों, परिवार के शैक्षणिक वातावरण और ज्ञान के प्रति समर्पण का भी गौरवपूर्ण प्रतीक है।
तीन पीएच.डी., 350 से अधिक शोधपत्र, 14 पुस्तकों का लेखन और युवा अवस्था में विश्वविद्यालय के नेतृत्व की जिम्मेदारी—ये उपलब्धियां डॉ. गौरव मिश्रा की निरंतर मेहनत और ज्ञान-साधना की कहानी कहती हैं। उनकी यह यात्रा चिकित्सा क्षेत्र के युवा पेशेवरों, शोधकर्ताओं और भावी शिक्षाविदों के लिए प्रेरणास्रोत है।








