नागपुर २८ : मनुष्य भिखारी नहीं हो सकता हैं, कोई और हो सकता हैं यह उदबोधन चर्या शिरोमणि पट्टाचार्य विशुद्धसागरजी गुरुदेव आज्ञानुवर्ती शिष्य मुनिश्री प्रशमसागरजी गुरुदेव ने शनिवार को श्री पार्श्वप्रभु दिगंबर जैन मोठे मंदिर के इंद्र भवन सभागृह आयोजित धर्मसभा में दिया।
मुनिश्री प्रशमसागरजी गुरुदेव ने कहा व्यक्ति बड़े पद पर चले गया तो अहंकार आ जाएगा, छोटे पद पर चला जाएगा तो हीन भावना आ जाएगी। किस बात की कमी हैं आपके पास। बनना हैं तो मिटते हुए को देखो, मिटना हैं तो बनते हुए को देखो। हम अच्छाई भी भी देख सकते हैं, बुराई को भी देख सकते हैं। हम एक आंख से अच्छा देखते हैं और एक आंख से बुरा देखते हैं। बुराई में भी अच्छा देखते हैं। दूसरों को दोष देने से कुछ नहीं होता, अपने अंदर गुण होना चाहिए। जब तक व्यक्ति के पास दूसरा पर्याय होता हैं तो वह सही रास्ते पर चल नहीं सकता। जिसके पास एक पर्याय होता हैं, दूसरा पर्याय ही नहीं हैं उसी दिन उस व्यक्ति की कमजोरी की ताकत बन जाती हैं। चारित्र्य पालन करने के लिए एक पर्याय होता हैं। चारित्र्य की विरासत के लिए अनेक पर्याय हैं। चारित्र्य पालन के लिए एक ही पर्याय होता हैं। यह सोचना हैं कि मेरे पास दूसरा पर्याय ही नहीं हैं। हमारे पास हजारों पर्याय हैं हम क्यों सफल नहीं हो रहे हैं। हम क्यों नहीं पहुंच पाते मोक्ष के मार्ग में। एक पर्याय रहे तो आपकी कितनी भी कमजोरी क्यों ना हो वह ताकत बन जाएगी। हमारे पास पर्याय ही पर्याय हैं हम एक स्विच बंद नहीं कर पाते। दुविधा हमारी सुविधा बन गई हो। बाजार में जाओ तो खाने के बहुत पर्याय हैं। शुद्ध खाने का घर में खाओ यही पर्याय हैं। तुम उसी की तारीफ करते हो हर चीज मुझे मिले। दुनियां तारीफ कर देती हैं। मनुष्य की परिभाषा यह हैं वह शिक्षा ग्रहण कर सकता हैं, दीक्षा ग्रहण कर सकता हैं। जो अच्छे बुरे की पहचान कर सकता हैं। बुरे से भी अच्छा मिल सकता हैं। मनुष्य भिखारी नहीं हो सकता हैं, कोई और हो सकता हैं। भिखारी उसकी शैतानियत हो सकती हैं। पर मनुष्य नहीं हो सकता हैं। दया आती हैं लेकिन दया कोई नहीं चाहता। भगवान से मांगो सभी चीज मिल जाती हैं, हमें पता नहीं हम कौन सी चीज मांगे, हमें आज तक नहीं पता हमे चाहिए क्या। भगवान यह महिमा हैं, नहीं मांगोगे तो सब कुछ मिलेगा। मांगोगे तो उतना ही मिलेगा और समस्या बनी रहेगी। मांगोगे तो मिल जाएगा लेकिन भगवान नहीं मिल पाएंगे। भगवान मिल गए तो तुम्हें किसी चीज की जरूरत नहीं पड़ेगी। जो भगवान को चुन लेता हैं उसे सब कुछ मिल जाता हैं। जिसे सब कुछ मिल जाता वह भगवान का आशीर्वाद चाहता हैं।
मुनिश्री सुप्रभसागरजी गुरुदेव ने उदबोधन में कहा कषायों का निग्रह करो, कषायों को नष्ट करो। क्रोध, मान, माया, लोभ सभी कषायों को कम कर सकते हैं। दूसरे के प्रमाद से धर्मात्मा, सम्यगदृष्टी होता ही नहीं हैं, व्यवहार सम्यगदृष्टी बन सकते हैं। व्यवहार से सच्चे देव शास्त्र गुरु को मानते हैं और देव शास्त्र गुरु की मानना चाहिए। स्वयं को सत्य पहुंचाने का प्रयास करना ए। देव शास्त्र गुरु पर , अगाढ श्रद्धा होना चाहिए।
धर्मसभा का संचालन मुकेश गंगवाल ने किया।
श्री पार्श्वप्रभु दिगंबर जैन सैतवाल मंदिर के पदाधिकारियों ने मुनिसंघ से निवेदन किया कि समाज के कल्याण के लिए कुछ समय हमें देवे।




