नागपुर :- खासदार सांस्कृतिक महोत्सव के मंच पर जब “सब मिलके प्रार्थना है” की स्वरधारा वातावरण में गूंजी, तो पूरा परिसर भक्ति और देशभक्ति के रंग में सरोबार हो गया। यह दृश्य केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक अनुभूति बन गया। सुमारे 1500 कलाकारों ने भजन, नृत्य और नाट्य के माध्यम से राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज के जीवन का जीवंत चित्र साकार किया। ‘राष्ट्रसंतों की जीवनगाथा’ नामक यह संगीत-नाट्य प्रस्तुति भक्ति, कला और समाज सुधार के संदेश का अद्भुत संगम थी, जिसने दर्शकों को भावविभोर कर दिया।
इस प्रस्तुति में राष्ट्रसंतों के जीवन के विविध अध्यायों को भजनों की स्वरधारा के माध्यम से जोड़ा गया था। “चला हो पंढरी जाऊ”, “पावन पतित तुम”, “गोकुल में भगवान”, “या भारतात बंधुभाव”, “भगवान मला मरू दे” और “राष्ट्रवंदन (तन-मन-धन से)” जैसे भजनों ने जीवन के विविध प्रसंगों को मंच पर सजीव कर दिया। जन्म से लेकर ब्रह्मलीन होने तक की यात्रा का यह कलात्मक रूपांकन भावनाओं से परिपूर्ण था।

राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज का जन्म 30 अप्रैल 1909 को अमरावती जिले के यावली गांव में हुआ था। उन्होंने संपूर्ण जीवन लोकजागरण, भक्ति और मानवसेवा के लिए समर्पित किया। उनका ‘खंजिरी भजन आंदोलन’ केवल आध्यात्मिक नहीं, बल्कि समाज परिवर्तन का एक सशक्त माध्यम था। उनके भजनों में ग्रामोन्नति, स्वावलंबन, नैतिकता, एकता और राष्ट्रीय चेतना का गहरा संदेश मिलता है।
कार्यक्रम में उनके जीवन से जुड़े अनेक प्रेरणादायी प्रसंगों को भावपूर्ण ढंग से मंचित किया गया। महात्मा गांधी से हुई ऐतिहासिक मुलाकात, जिसमें उन्होंने ‘सेवा ही सर्वोच्च धर्म’ का संदेश दिया; राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख गुरुजी गोलवलकर से संवाद; और तत्कालीन शासन को जनजागरण के माध्यम से चेताने के उनके प्रयासों का मार्मिक प्रदर्शन किया गया। कारावास के दौरान रचित उनका भजन “माणूस द्या माझा माणूस, धर्म नका विचारू” आज भी मानवता की सशक्त पुकार के रूप में गूंजता है।
संगीत संयोजन श्रीकांत पिसे ने किया, जबकि राजेश खाड़े ने तुकड़ोजी महाराज की भूमिका को भावपूर्ण अभिनय से जीवंत कर दिया। भास्कर संगीत महाविद्यालय की छात्राओं ने प्रीति धाकडे के मार्गदर्शन में संगीत प्रस्तुत किया। विशेष रूप से आराध्या डबली ने अपने करियर का पहला मंचीय प्रदर्शन करते हुए अपनी अभिव्यक्ति से सबका मन मोह लिया।

“जब किसानों की देखूं कव्वाली” और “हर देश में तू” जैसी प्रस्तुतियों ने इस कार्यक्रम को और भी ऊंचा आयाम दिया। इन गीतों में निहित सामाजिक और राष्ट्रीय भावनाओं ने दर्शकों के भीतर गर्व और संवेदना की लहर जगा दी।
केंद्रीय मंत्री नितिन गडकरी और अन्य मान्यवरों की उपस्थिति ने कार्यक्रम की गरिमा और बढ़ा दी। गडकरी ने कलाकारों की प्रशंसा करते हुए कहा कि तुकड़ोजी महाराज के विचार आज भी समाज के लिए उतने ही प्रासंगिक हैं, जितने स्वतंत्रता संग्राम के काल में थे।
राष्ट्रसंत का देहावसान 11 अक्टूबर 1968 को गुरुकुंज-मोजरी में हुआ, परंतु उनके विचार आज भी समाज में जीवंत हैं। उनकी अंतिम क्षणों का मंचन अत्यंत प्रभावशाली और भावुक करने वाला था।
‘राष्ट्रसंतों की जीवनगाथा’ केवल एक सांस्कृतिक प्रस्तुति नहीं थी, बल्कि यह श्रद्धा, समर्पण और समाज के प्रति उत्तरदायित्व की अभिव्यक्ति थी। इस कार्यक्रम ने यह सिद्ध किया कि जब कला भक्ति से जुड़ती है, तो वह समाज परिवर्तन की प्रेरक शक्ति बन जाती है। संगीत, प्रकाश और दृश्य संयोजन का उत्कृष्ट तालमेल इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी विशेषता रही।
कार्यक्रम के प्रत्येक अंश में राष्ट्रसंतों के विचारों की गूंज थी – भक्ति में कर्म का संदेश, समाज में एकता का आह्वान, और देश के लिए बलिदान की भावना। “पत्थर सारे बॉम्ब बनेंगे, भक्त बनेगी सेना” और “झाडझडुले शस्त्र बनेंगे, नाव लगेगी किनारे” जैसे गीतों ने जनमानस को जोश और संकल्प से भर दिया। तबला, ढोलक, खंजिरी, टाळ और अन्य वाद्यों के साथ सामूहिक संगीत प्रस्तुति ने कार्यक्रम को भव्यता प्रदान की।

एक साथ सैकड़ों कलाकारों का मंच पर प्रदर्शन एक अद्भुत दृश्य था। वीडियो और लाइट इफेक्ट्स के माध्यम से दिखाए गए कृष्णधवल दृश्यों ने प्रस्तुति को और प्रभावशाली बना दिया। यह कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि इतने विशाल स्तर पर तैयार किया गया यह संगीत-नाट्य प्रयोग मराठी सांस्कृतिक जगत के इतिहास में एक मील का पत्थर साबित हुआ।
नाट्य प्रयोग की टीम:
पटकथा व लेखन – गोपाल सालोडकर
निर्माता – देवेंद्र यादव
संगीत संयोजन – श्रीकांत पिसे
नृत्य निर्देशन – अक्षय धवडगांवकर
नाट्य निर्देशन – अतुल शेम्बे
संकलन सहयोग – अमोल बांबल
समन्वयक – सुधाकर आंबूसकर
वीडियो संपादन – मनोज पिदडी
ऑडियो संपादन – पवन तिवारी
सूत्रसंचालन – देवेंद्र दोडके
मुख्य भूमिका – राजेश खाड़े
इस प्रस्तुति के माध्यम से राष्ट्रसंत तुकड़ोजी महाराज को श्रद्धांजलि अर्पित करने का यह प्रयास भाव, भक्ति और भारतभक्ति का एक अद्भुत संगम बना। इस कार्यक्रम ने यह संदेश दिया कि राष्ट्रसंतों के विचार केवल इतिहास नहीं, बल्कि आज भी मानवता के मार्गदर्शक हैं।
– डॉ. प्रवीण डबली, वरिष्ठ पत्रकार




