– HC ने सरकार और मनपा से पूछा- इतना खर्च फिर भी हालात क्यों नहीं सुधरे?
नागपुर :- नाग नदी की सफाई और प्रदूषण नियंत्रण पर करोड़ों रुपए खर्च होने के बावजूद नदी की स्थिति में अपेक्षित सुधार नहीं होने पर बॉम्बे हाईकोर्ट की नागपुर खंडपीठ ने महाराष्ट्र सरकार और नागपुर महानगरपालिका की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। न्यायमूर्ति अनिल किलोर और न्यायमूर्ति रजनीश व्यास की खंडपीठ ने नाग नदी में प्रदूषण से संबंधित एक रिपोर्ट का स्वत: संज्ञान लेते हुए मामले को जनहित याचिका (पीआईएल) में परिवर्तित किया है।
सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि नागपुर शहर में प्रतिदिन करीब 520 मिलियन लीटर सीवेज उत्पन्न होता है। इसमें से लगभग 423.5 मिलियन लीटर सीवेज का उपचार किया जाता है। उपचारित पानी में से करीब 320 मिलियन लीटर पानी कोराडी और खापरखेड़ा ताप विद्युत केंद्रों को दिया जाता है, जबकि शेष उपचारित पानी नाग नदी में छोड़ा जाता है।नदी आगे चलकर गोसीखुर्द बांध में मिलती है। ऐसे में नदी में छोड़े जा रहे पानी का जलाशय की गुणवत्ता पर पड़ने वाले संभावित प्रभाव को लेकर भी चिंता जताई गई।
1926.99 करोड़ की परियोजना पर सवाल:
अदालत को बताया गया कि नाग नदी के प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केंद्र और राज्य सरकार के सहयोग से 1926.99 करोड़ रुपए की परियोजना पर काम चल रहा है। इसमें सीवेज ट्रीटमेंट प्लांट, 500 किलोमीटर से अधिक सीवरेज नेटवर्क और पंपिंग स्टेशनों का निर्माण शामिल है।इतने बड़े पैमाने पर सार्वजनिक धन खर्च किए जाने के बावजूद नदी की स्थिति में अपेक्षित सुधार क्यों नहीं हुआ, इस पर खंडपीठ ने सवाल उठाया। अदालत ने यह भी पूछा कि परियोजना पूरी होने के बाद भी यदि नदी प्रदूषित रहती है तो इसकी जिम्मेदारी किसकी होगी और चल रहे कार्यों की निगरानी कौन कर रहा है।
16 साल पुराने आदेशों का भी जिक्र:
खंडपीठ ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि नदी की सफाई को लेकर करीब 16 वर्ष पहले आदेश दिए गए थे, लेकिन इतने समय बाद भी स्थिति में पर्याप्त बदलाव नहीं आया है। अदालत ने राज्य सरकार और मनपा को अगली सुनवाई में नाग नदी के प्रदूषण की समस्या के समाधान के लिए ठोस कार्ययोजना पेश करने का निर्देश दिया।





