– हाई कोर्ट ने लिया कड़ा संज्ञान
नागपुर :- क्षेत्रीय मेंटल अस्पताल में मनोविकारों की आवश्यक दवाओं की भारी कमी के कारण मरीजों और उनके परिजनों को भीषण कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है. दवाओं की अनुपलब्धता इस कदर बढ़ गई है कि परिजन डॉक्टरों से बाहर की दवाएं लिखने का अनुरोध कर रहे हैं लेकिन अस्पताल के नियमों के कारण डॉक्टर बाहर का प्रिर्सक्रप्शन भी नहीं दे पा रहे हैं. इस गंभीर स्थिति को देखते हुए हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लेते हुए एक जनहित याचिका के रूप में स्वीकार किया. डेढ़ साल से दवाओं का टोटा, खरीद नियमों ने बढ़ाई मुश्किल : अस्पताल प्रशासन के पास आवश्यक दवाएं उपलब्ध कराना फिलहाल असंभव हो गया है
क्योंकि राज्य सरकार ने दवा खरीद के अधिकार औषधि प्राधिकरण बोर्ड को सौंप दिए हैं. स्थानीय प्रशासन के पास केवल 30 प्रतिशत दवाएं खरीदने का अधिकार है और वे स्वतंत्र रूप से खरीद प्रक्रिया नहीं चला सकते. जानकारी के अनुसार मनोविकारों के उपचार के लिए आवश्यक 10 महत्वपूर्ण दवाओं की पिछले डेढ़ वर्षों से भारी कमी बनी हुई है. हिंसक हो रहे मरीज, कर्मचारियों की जान को खतरा : विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की रिपोर्ट के अनुसार हृदय रोग के बाद डिप्रेशन दुनिया की दूसरी सबसे गंभीर बीमारी है. मानसिक रोगों में समय पर दवा मिलना अनिवार्य होता है लेकिन अस्पताल में दवाओं के अभाव में भर्ती मरीज अक्सर हिंसक हो जाते हैं. ऐसे मरीजों को संभालना चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों के लिए बड़ी चुनौती बन गया है और उनके जीवन को खतरा पैदा होने की आशंका जताई जा रही है. कोर्ट ने इस स्थिति की गंभीरता को देखते हुए एक सप्ताह के भीतर जनहित याचिका पर सुनवाई के निर्देश दिए हैं. ओपीडी : प्रति दिन औसतन 300 मरीजों का पंजीकरण, कुल भर्ती मरीज : 500 से अधिक (280 पुरुष और 250 महिलाएं) प्रशासन की जिम्मेदारी : मरीजों की स्वच्छता, काउंसिलिंग, भोजन और उपचार की पूरी जिम्मेदारी अस्पताल प्रशासन पर है.








