– लोकतंत्र का उत्सव या शिक्षा की कुर्बानी? चुनावी ड्यूटी ने स्कूलों को किया डिस्टर्ब
– रैलियों और पोस्टरों के बीच भटकी पढ़ाई, शिक्षक चुनाव में व्यस्त, बच्चे परेशान
नागपुर :- शहर में चुनावी सरगर्मी तेज हो चुकी है। सड़कों पर पोस्टर, रैलियां और प्रचार चरम पर है, लेकिन इस पूरे माहौल की सबसे खामोश पीड़ा अगर कोई झेल रहा है, तो वे हैं स्कूली बच्चे और उनके शिक्षक। एक ओर चुनावी ड्यूटी के कारण स्कूलों की नियमित पढ़ाई बुरी तरह प्रभावित हो रही है और कई जगह तो कक्षाएं लगभग खाली पड़ी हैं। वहीं दूसरी ओर परीक्षा नजदीक होने से विद्यार्थी और अभिभावक चिंतित नजर आ रहे हैं। मनपा के कई स्कूल पहले से ही शिक्षकों की कमी से जूझ रहे हैं। ऐसे में चुनावी ड्यूटी ने उनकी मुश्किलें और बढ़ा दी हैं। चुनाव में अभी करीब दस दिन शेष हैं, लेकिन शिक्षकों की ड्यूटी पहले ही लगा दी गई है, जिसके चलते पढ़ाई का पूरा ढांचा अस्त-व्यस्त हो गया है।
सिर्फ नागपुर महानगरपालिका के स्कूल ही नहीं, बल्कि जिला परिषद स्कूल, शासन मान्यता प्राप्त निजी विद्यालय और यहां तक कि विश्वविद्यालय के कुछ शिक्षकों को भी चुनावी काम में झोंक दिया गया है। नाम न छापने की शर्त पर शिक्षक बताते हैं कि प्रशासन की प्राथमिकता सूची में शिक्षा पीछे चली जाती है और चुनावी काम “अनिवार्य” बताकर उन पर दबाव बनाया जाता है।
एक मनपा स्कूल के शिक्षक ने नाम न छापने की शर्त पर बताया कि हमारे स्कूल में कुल पांच शिक्षक है, जिनमें से तीन की ड्यूटी जोन कार्यालय में लगा दी गई है। अब सिर्फ दो शिक्षक पूरे स्कूल के बच्चों को संभाल रहे हैं। न नियमित कक्षाएं लग पा रही हैं, न अभ्यासक्रम पूरा हो पा रहा है। ऊपर से आदेश यह है कि चुनावी काम प्राथमिकता से करें। बच्चों की पढ़ाई कौन देखे, इसका जवाब किसी के पास नहीं है। बोर्ड परीक्षाओं और सत्रांत परीक्षाओं के निकट आने के बावजूद बच्चों की पढ़ाई का कीमती समय चुनावी तैयारियों में खर्च हो रहा है। कई स्कूलों में प्रैक्टिकल, आंतरिक मूल्यांकन और प्रोजेक्ट वर्क भी अधर में लटके हैं। शिक्षक मानते हैं कि इसका सीधा असर बच्चों के परिणाम और आत्मविश्वास पर पड़ेगा। इस वर्ष विशेष बात यह है कि पहली बार मनपा चुनाव के लिए ग्रामीण जिला परिषद के शिक्षक और कर्मचारियों को भी बुलाया गया है। इससे ग्रामीण स्कूलों की व्यवस्था पर भी असर पड़ रहा है और शिक्षा का ताना-बाना शहर से लेकर गांव तक प्रभावित हो रहा है। इसका सीधा असर बच्चों के भविष्य पर पड़ना लाजमी है।
“लोकतंत्र का उत्सव, पर कीमत कौन चुकाए?”
अभिभावकों और शिक्षकों का बड़ा सवाल यही है कि यदि चुनाव लोकतंत्र का उत्सव है, तो क्या इस उत्सव की कीमत बच्चों की शिक्षा को चुकानी पड़ेगी? मांग यह उठ रही है कि चुनावी व्यवस्था अपने स्थान पर रहे, मगर शिक्षा जैसी बुनियादी जिम्मेदारी को चुनावी मशीनरी के बोझ तले न दबाया जाए।




