– चार महीने तक अनसुनी रही शिकायत
बेला :- वार्ड नं. 5 के हेलूंडे ले-आउट निवासी प्रवीण क्षीरसागर के घर के सामने नाले में गंदा पानी जमा हो जाता है। इसकी दुर्गंध स्वास्थ्य के लिए खतरा बन गई है और ग्रान पंचायत जानबूझकर इसे नजरअंदाज कर रही है और पानी का निपटान नहीं कर रही है। क्षीरसागर ने चेतावनी दी थी कि वे । जुलाई से बेला ग्राम पंचायत के सामने अपने परिवार के साथ अनिश्चितकालीन भूख हड़ताल पर बैठेंगे। इसके चलते अपर तहसीलदार ने ग्राम पंचायत को लिखित आदेश जारी कर समाधान निकालने को कहा। इससे स्थानीय प्रशासन में हड़कंप मच गया। सरपंच अरुण बालपांडे और सचिव साहबराव शंभरकर द्वारा नाले के निर्माण के लिए 20 दिन की समय सीमा मांगे जाने के बाद क्षीरसागर ने भूख हड़ताल स्थगित कर दी।
प्रवीण क्षीरसागर के घर के सामने ग्राम पंचायत का नाला है, जिससे होकर पंद्रह बीस घरों का गंदा पानी बहता है। उनके घर के बाद नाले में पर्याप्त ढलान न होने के कारण गंदा पानी वहीं जमा हो जाता है। इससे दुर्गंध आती है। क्षीरसागर ने बताया कि इस वजह से उन्हें घर में बैठना भी मुश्किल हो गया है। पिछले चार-पांच महीनों में उन्होंने नाले को लेकर कई शिकायतें और ज्ञापन दिए हैं, लेकिन कोई कार्रवाई नहीं की गई। उन्होंने उमरेड पंचायत समिति के समूह विकास अधिकारी धवल जिंगरे और विधायक संजय मेश्राम को भी ज्ञापन सौंपा। उन्होंने सरपंच बालपांडे और सचिव साहबराव शंभरकर से भी बात की और कारवाई के लिए लिखित पत्र दिया। इसके बावजूद समस्या का समाधान नहीं किया गया। इससे परेशान होकर क्षीरसागर ने ग्राम पंचायत और संबंधित वरिष्ठ अधिकारियों को लिखित चेतावनी दी। इसके चलते स्थानीय प्रशासन में हलचल मच गई। बेला के अपर तहसीलदार रवींद्र होली ने सरपंच और सचिव को बुलाया और उन्हें लिखित पत्र देकर नाले में जना गंदे पानी का तुरंत निपटान करने और भूख हड़ताल समाप्त कराने को कहा। अन्यथा, इसके परिणाम भुगतने के लिए वे स्वयं जिम्मेदार होंगे। इससे ग्राम पंचायत में हड़कंप मच गया। उन्होंने नाली की पाइप बिछाने और भूमिगत निर्माण कार्य करने के लिए 20 दिन का समय मांगा। इसके चलते क्षीरसागर ने भूख हड़ताल समाप्त कर दी। थानेदार उमेश नसारे उक्त समझौता बैठक में उपस्थित थे।प्रवीण क्षीरसागर के ढाई वर्षीय बेटे प्रियांश की नाले की दुर्गंध के कारण चार-पांच बार गंभीर तबीयत खराब हो गई। हिंगणघाट और नागपुर के निजी अस्पतालों में भर्ती कराने के बाद उसकी जान बच पाई। क्षीरसागर ने अपने ज्ञापन में बताया है कि उन्हें शारीरिक और मानसिक पीड़ा के साथ-साथ चार से पांच लाख रुपये का खर्च भी करना पड़ा।
सिर्फ पाइप डालकर खत्म नहीं हुई समस्या
भूख हड़ताल का ज्ञापन देने के बाद, खुले नाले में पाइप डालकर उसे भूमिगत कर दिया गया, लेकिन उसके आगे सड़क की खुदाई नहीं की गई और नाले को नीचे नहीं उतारा गया। इस वजह से नाले का गंदा पानी यह नहीं पाया। वह पाइप में ही जमा रहा। साथ ही, नाले को पानी के बहाव की दिशा में खुला छोड़ दिया गया। इस नाममात्र के उपाय के कारण दुर्गंध की समस्वा पहले जैसी ही बनी हुई है। बीमारियों के फैलने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता। इसलिए प्रवीण क्षीरसागर भूख हड़ताल पर जाने के लिए अड़े रहे।




