– सड़कों के धंसने जैसी घटनाओं के लिए प्रकृति नहीं, बल्कि इंसान जिम्मेदार
नई दिल्ली :- सुप्रीम कोर्ट ने हिमालयी राज्यों में बिगड़ते पारिस्थितिक संतुलन पर चिंता जताते हुए कहा है कि यह पूरा क्षेत्र एक गंभीर अस्तित्व संकट का सामना कर रहा है। कोर्ट ने हिमाचल प्रदेश सरकार से इस संबंध में कई सवालों के जवाब मांगे हैं। जस्टिस विक्रम नाथ और संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि इस मानसून में हिमाचल में भारी बारिश और भूस्खलन से सैकड़ों लोगों की जान गई और हजारों संपत्तियां तबाह हो गईं। हिमाचल का नाजुक इकोसिस्टम बुरी तरह प्रभावित हुआ है। पूरा हिमालयी क्षेत्र गंभीर संकट में है। लगातार हो रहे भूस्खलन, मकानों के गिरने, सड़कों के धंसने जैसी घटनाओं के लिए प्रकृति नहीं, बल्कि इंसान जिम्मेदार है। विशेषज्ञों की रिपोर्ट के हवाले से कोर्ट ने कहा कि हिमाचल में तबाही के बड़े कारण हाइड्रो पावर प्रोजेक्ट्स, फोर लेन सड़कें, जंगलों की कटाई और बहुमंजिला इमारतें हैं। कोर्ट ने माना कि पर्यटन हिमाचल की आय का बड़ा स्रोत है, लेकिन अनियंत्रित पर्यटन से पर्यावरण पर भारी दबाव पड़ा है। राज्य को पर्यटन और पर्यावरण के बीच संतुलन बनाना होगा। राज्य में कितने जंगल और पेड़ पिछले 20 सालों में काटे गए और कितने लगाए गए। कितने बड़े पेड़ काटने की अनुमति निजी कंपनियों और सरकारी उपक्रमों को दी गई। राज्य में कितने हाइड्रो प्रोजेक्ट और खनन (माइनिंग) प्रोजेक्ट चल रहे हैं। पर्यटन को नियंत्रित करने के लिए क्या उपाय किए गए, खासकर बरसात के समय। आपदा प्रबंधन की योजना और उस पर खर्च किए गए फंड का ब्यौरा। राज्य की सड़कों और हाईवे की जानकारी, जिनमें कितनी फोर-लेन सड़कें बनी हैं और कितने प्रोजेक्ट प्रस्तावित हैं।




