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ईरान युद्ध और LPG की बढ़ती कीमतें: वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए चेतावनी- आकाश सपेलकर- अधिवक्ता

नागपुर :- मध्य पूर्व में जारी ईरान से जुड़ा सैन्य तनाव आज केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं रह गया है, बल्कि उसने पूरी दुनिया की ऊर्जा व्यवस्था और आर्थिक संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है। विशेष रूप से रसोई गैस यानी एलपीजी (Liquefied Petroleum Gas) की कीमतों में तेज़ वृद्धि ने आम आदमी से लेकर उद्योग जगत तक सभी को चिंता में डाल दिया है। यह स्थिति हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि क्या हमारी ऊर्जा निर्भरता हमें भविष्य में और बड़े संकटों की ओर धकेल रही है।

ईरान का भू-राजनीतिक महत्व इसलिए भी अधिक है क्योंकि उसके पास स्थित होरमुज़ जलडमरूमध्य वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति का सबसे महत्वपूर्ण मार्ग है। दुनिया का एक बड़ा हिस्सा—तेल और गैस सहित एलपीजी—इसी रास्ते से होकर गुजरता है। जैसे ही युद्ध या तनाव के कारण इस मार्ग पर खतरा बढ़ता है, तुरंत वैश्विक बाजार में आपूर्ति बाधित होती है। परिणामस्वरूप, एलपीजी की कीमतों में अचानक उछाल देखने को मिलता है।

एलपीजी की खासियत यह है कि यह केवल घरेलू उपयोग तक सीमित नहीं है। इसका उपयोग खाद्य उद्योग, रसायन, परिवहन और छोटे-बड़े उद्योगों में व्यापक रूप से होता है। ऐसे में जब इसकी कीमत बढ़ती है, तो इसका प्रभाव केवल गैस सिलेंडर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि हर वस्तु की लागत बढ़ने लगती है। यही कारण है कि एलपीजी महंगाई को “मल्टीप्लायर प्रभाव” (Multiplier Effect) का मुख्य कारक माना जाता है।भारत जैसे देश, जो अपनी ऊर्जा आवश्यकताओं के लिए आयात पर काफी निर्भर हैं, इस संकट से सबसे अधिक प्रभावित होते हैं। भारत अपनी एलपीजी का बड़ा हिस्सा मध्य पूर्व से आयात करता है। ऐसे में युद्ध के कारण आपूर्ति बाधित होते ही घरेलू बाजार में कीमतों का बढ़ना स्वाभाविक है। इसका सीधा असर आम जनता की रसोई पर पड़ता है, जहां पहले से ही महंगाई का दबाव बना हुआ है। सरकार पर भी सब्सिडी का बोझ बढ़ता है, जिससे राजकोषीय संतुलन प्रभावित होता है।

दूसरी ओर, यूरोप और अमेरिका जैसे विकसित देश भी इस संकट से अछूते नहीं हैं। यूरोप पहले ही ऊर्जा संकट से जूझ रहा है, और अब गैस की बढ़ती कीमतों ने उसकी औद्योगिक उत्पादन क्षमता पर दबाव बढ़ा दिया है। अमेरिका में भी ईंधन महंगाई के कारण महंगाई की दूसरी लहर की आशंका जताई जा रही है, जिससे उपभोक्ता खर्च और आर्थिक वृद्धि दोनों प्रभावित हो सकते हैं।

सबसे गंभीर स्थिति विकासशील देशों की है, जहां ऊर्जा आयात पर अत्यधिक निर्भरता है और आर्थिक संसाधन सीमित हैं। इन देशों में एलपीजी की कीमत बढ़ने का सीधा असर गरीब और मध्यम वर्ग पर पड़ता है, जिससे जीवन स्तर में गिरावट आती है। कई बार लोगों को मजबूर होकर पारंपरिक ईंधनों की ओर लौटना पड़ता है, जो पर्यावरण और स्वास्थ्य दोनों के लिए हानिकारक है।यह संकट केवल वर्तमान का नहीं, बल्कि भविष्य का भी संकेत देता है। यदि ईरान से जुड़ा यह संघर्ष लंबा चलता है, तो वैश्विक ऊर्जा बाजार में अस्थिरता बनी रह सकती है। इससे न केवल कीमतें ऊंची रहेंगी, बल्कि ऊर्जा सुरक्षा भी खतरे में पड़ सकती है। यही कारण है कि अब विश्व के कई देश वैकल्पिक ऊर्जा स्रोतों—जैसे सौर ऊर्जा, पवन ऊर्जा और इलेक्ट्रिक तकनीक—की ओर तेजी से बढ़ रहे हैं।

भारत के लिए यह समय एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हो सकता है। यदि हम अपनी ऊर्जा नीति को आत्मनिर्भरता की दिशा में नहीं ले जाते, तो भविष्य में ऐसे वैश्विक संकट हमारे लिए और अधिक गंभीर हो सकते हैं। हमें न केवल आयात पर निर्भरता कम करनी होगी, बल्कि घरेलू उत्पादन, पाइप गैस नेटवर्क और नवीकरणीय ऊर्जा को भी बढ़ावा देना होगा। साथ ही, ऊर्जा के रणनीतिक भंडारण (Strategic Reserves) पर भी ध्यान देना आवश्यक है।अंततः, ईरान युद्ध और एलपीजी की बढ़ती कीमतें हमें यह सिखाती हैं कि ऊर्जा केवल आर्थिक संसाधन नहीं, बल्कि वैश्विक राजनीति का एक शक्तिशाली हथियार भी है। जब तक दुनिया इसके प्रति संतुलित और आत्मनिर्भर दृष्टिकोण नहीं अपनाती, तब तक किसी भी क्षेत्रीय संघर्ष का प्रभाव हर देश की रसोई तक पहुंचता रहेगा।

इसलिए आज आवश्यकता है दूरदर्शी नीतियों की, जो न केवल वर्तमान संकट से निपटने में मदद करें, बल्कि भविष्य को भी सुरक्षित और स्थिर बनाएं।

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