– फिर भी बहुमत बीजेपी के पास
नागपुर :- राजस्व मंत्री चंद्रशेखर बावनकुले ने नागपुर विधान परिषद सीट पर निर्विरोध जीत हासिल करने के लिए पर्दे के पीछे से राजनीतिक चालें चली थीं. उनका मकसद आम सहमति से निर्विरोध चुनाव कराकर नागपुर में ‘महायुति’ गठबंधन का दबदबा और ताकत दिखाना था. हालांकि, कांग्रेस नेता और पूर्व मंत्री सुनील केदार ने इस दबाव के आगे झुकने से इनकार कर दिया और जबरदस्त दृढ़ संकल्प दिखाया. केदार के आक्रामक रुख ने ‘महायुति’ की सभी समझौता कोशिशों को बेकार कर दिया, जिससे आखिरकार बावनकुले की निर्विरोध चुनाव की कोशिश नाकाम हो गई.
वरिष्ठ बीजेपी नेता चंद्रशेखर बावनकुले ने हाल ही में हुए विधानसभा चुनाव में जीत के बाद अपनी विधान परिषद सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. इसके बाद, राज्य चुनाव आयोग ने खाली हुई सीट के लिए उपचुनाव की घोषणा की. बीजेपी ने इस सीट के लिए अपने पूर्व जिला अध्यक्ष डॉ. राजीव पोतदार को मैदान में उतारा है.स्थानीय निकायों में संख्या बल को देखते हुए, फिलहाल बीजेपी का पलड़ा भारी माना जा रहा है. फिर भी, कोई जोखिम न लेते हुए, बीजेपी ने जीत सुनिश्चित करने के लिए अपनी पूरी संगठनात्मक मशीनरी को पूरी ताकत से जुटा दिया है.
इस बीच, कांग्रेस पार्टी ने इस चुनाव को काफी प्रतिष्ठा का मामला बना लिया है. शुरू में, राजनीतिक हलकों में कांग्रेस के भीतर आपसी तालमेल की कमी को लेकर अटकलें लगाई जा रही थीं, क्योंकि राज्य प्रवक्ता अतुल लोंढे और पूर्व जिला परिषद सदस्य दिनेश ढोले दोनों ने नामांकन पत्र दाखिल किए थे. हालांकि, नामांकन वापस लेने के आखिरी दिन, पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की मध्यस्थता के बाद दिनेश ढोले ने अपनी उम्मीदवारी वापस ले ली. ढोले के हटने के साथ, अतुल लोंढे मैदान में कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार बने हुए हैं, जिससे पार्टी के अंदरूनी विवाद पर कुछ समय के लिए विराम लग गया है.
इस चुनाव क्षेत्र में नागपुर मनपा के साथ-साथ ज़िले की अलग-अलग नगर परिषदों और नगर पंचायतों के लगभग 836 चुने हुए प्रतिनिधि वोट डालेंगे. हालांकि कागजों पर गणित बीजपी के पक्ष में है, फिर भी कांग्रेस ने इस मुकाबले को सिर्फ ़ एक औपचारिकता न मानकर बीजेपी को सीधी चुनौती देने का फ़ैसला किया है. भले ही नागपुर बीजेपी का गढ़ रहा हो, लेकिन सुनील केदार और कांग्रेस पार्टी के आक्रामक रुख ने बीजेपी और कांग्रेस के बीच सीधी टक्कर का माहौल बना दिया है.



