– दिनभर भटकती जनता, शाम को ‘रसूखदारों’ की एंट्री? जिल्हा खनिज विभाग चर्चा के केंद्र में
नागपुर :- नागपुर कलेक्टर कार्यालय इन दिनों लगातार चर्चा में है। आम नागरिकों का आरोप है कि वे दिनभर अपने काम के लिए चक्कर लगाते-लगाते थक जाते हैं, लेकिन उनके काम समय पर पूरे नहीं होते। वहीं, चर्चा है कि प्रभावशाली और रसूखदार लोग शाम के समय कार्यालय पहुंचते हैं और उनका काम आसानी से हो जाता है। नागरिकों के बीच यह भी चर्चा है कि कार्यालय निर्धारित समय के बाद भी देर रात तक खुला रहता है, जिससे पारदर्शिता को लेकर शंकाएं खड़ी हो रही हैं।
कुछ लोगों का आरोप है कि यह सब कथित रूप से कुछ अधिकारियों और कर्मचारियों के साथ “मधुर संबंधों” या “लेन-देन” के माध्यम से संभव होता है। हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठती चर्चाओं ने जिला खनिज विभाग सहित अन्य विभागों को भी सवालों के घेरे में ला खड़ा किया है।
सरकारी समयानुसार कार्यालय सुबह 9:15 बजे से शाम 6:15 बजे तक संचालित होता है। इसके बावजूद कुछ लोगों का दावा है कि विभाग का कार्यालय कई बार रात 8 बजे या उससे भी अधिक समय तक खुला रहता है। ऐसे में सवाल उठता है कि जब आम नागरिकों के काम दिनभर चक्कर लगाने के बाद भी पूरे नहीं हो पाते, तो कार्यालय समय के बाद आखिर किस प्रकार के कार्य किए जाते हैं?
जिल्हाधिकारी कार्यालय बना चर्चा का केंद्र स्थानीय लोगों का कहना है कि शाम 6:30 बजे के बाद विभाग में कुछ चुनिंदा लोगों की आवाजाही बढ़ जाती है। आरोप यह भी हैं कि गिट्टी और रेत उत्खनन से जुड़े प्रभावशाली लोग इसी समय कार्यालय पहुंचते हैं। हालांकि इन दावों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन लगातार उठ रहे सवाल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर संदेह अवश्य उत्पन्न कर रहे हैं।
कुछ नागरिकों का यह भी कहना है कि जिनके काम दिन में नहीं हो पाते, वे कथित रूप से “विशेष प्रयासों” के जरिए शाम के समय अपना काम निकलवाने की कोशिश करते हैं। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह प्रशासनिक पारदर्शिता पर गंभीर प्रश्नचिह्न है।
जनता ने मांग की है कि प्रशासन इस मामले में स्पष्ट बयान जारी करे और आवश्यकता पड़ने पर आंतरिक जांच कर पारदर्शिता सुनिश्चित करे। सरकारी कार्यालयों का समय पर खुलना और बंद होना, तथा सभी कार्यों का नियमानुसार और समान रूप से निष्पादन होना, सुशासन की मूल अपेक्षा है।
जब तक इन सवालों पर स्पष्ट जवाब सामने नहीं आता, तब तक चर्चाओं और आरोपों का सिलसिला थमना मुश्किल है। प्रशासन की जिम्मेदारी है कि वह स्थिति स्पष्ट कर आम जनता का भरोसा कायम रखे।
दिन में दरवाजा बंद, अंदर क्या काम?
सूत्रों के अनुसार, कुछ दिनों पहले दिन के समय भी कार्यालय का दरवाजा अंदर से बंद कर कार्य किए जाने की चर्चा सामने आई है। हालांकि इस संबंध में कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है। जब कुछ नागरिकों ने पूछताछ की, तो उन्हें बताया गया कि “टेंडर प्रक्रिया” से संबंधित कार्य चल रहे थे।
इसके बावजूद आम लोगों के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या वास्तव में नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया चल रही थी या फिर कुछ और?
इन दिनों चर्चाओं का केंद्र विशेष रूप से जिला खनिज विभाग के अधिकारी खूब चर्चा में चल रहे है । आरोप है कि निर्धारित कार्यालय समय समाप्त होने के बाद भी विभाग में गतिविधियां जारी रहती हैं। वहीं, यदि आम नागरिक शाम 6:15 बजे के बाद पहुंचते हैं, तो उन्हें कार्यालय समय समाप्त होने का हवाला देकर लौटा दिया जाता है।
इसी को लेकर जनता सीधे सवाल उठा रही है —
क्या नियम केवल आम लोगों के लिए ही लागू होते हैं?
क्या कार्यालय समय के बाद होने वाले कार्यों का कोई अधिकृत रिकॉर्ड या लिखित आदेश उपलब्ध है?
नागरिकों का कहना है कि यदि अतिरिक्त समय में काम करना आवश्यक है, तो उसकी पारदर्शी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए, ताकि किसी भी प्रकार की शंका या भ्रम की स्थिति न बने।
पुरानी आकस्मिक जांच की चर्चा फिर तेज
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कई वर्ष पहले एक तत्कालीन जिला अधिकारी द्वारा की गई आकस्मिक जांच के दौरान कार्यालय परिसर में आपत्तिजनक स्थिति पाई गई थी। बताया जाता है कि अलमारी के नीचे और खिड़कियों के बाहर खाली बोतलें मिली थीं। इसके बाद कार्यालय समय का सख्ती से पालन करने के निर्देश जारी किए गए थे। अब एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं कि क्या उन निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं?
जनता की मांग: पारदर्शिता हो
प्रताड़ित महसूस कर रहे कुछ नागरिकों का कहना है कि यदि कार्यालय समय के बाद भी काम होते हैं तो उसकी स्पष्ट जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए। अन्यथा यह संदेह और चर्चाओं को जन्म देता है।
सरकारी कार्यालयों में समानता, पारदर्शिता और समयबद्ध कार्यप्रणाली ही सुशासन की पहचान है। जब आम जनता दिनभर भटकती रहे और चुनिंदा लोगों के काम आसानी से होते दिखाई दें? तो सवाल उठना स्वाभाविक है। अब निगाहें प्रशासन पर हैं — क्या इन चर्चाओं पर कोई स्पष्ट जवाब आएगा या मामला यूं ही चर्चाओं तक सीमित रहेगा?








