नीट पेपर लीक: एक साल बाद भी न्याय का इंतजार
– क्या परीक्षा माफिया कानून से ऊपर है?
– नीट से लेकर सिस्टम पर सवाल
देश में नीट -उग 2024 पेपर लीक विवाद के बाद करोड़ों छात्रों और अभिभावकों के मन में एक बड़ा सवाल खड़ा हुआ है कि क्या छात्रों को कभी न्याय मिलेगा और क्या भविष्य में ऐसी घटनाएं रुक पाएंगी? यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत में पेपर लीक मामलों का रिकॉर्ड बेहद निराशाजनक रहा है. पिछले 23 वर्षों में सामने आए 50 से अधिक बड़े पेपर लीक मामलों में केवल दो मामलों में ही आरोपियों को सजा मिल सकी. अधिकांश मामलों में आरोपी गिरफ्तार तो हुए, लेकिन अदालतों में मुकदमे वर्षों तक चलते रहे और दोषसिद्धि नहीं हो सकी.
5 मई 2024 की सुबह झारखंड के हजारीबाग स्थित एक स्कूल के कंट्रोल रूम में कथित तौर पर सीलबंद ट्रंकों को विशेष उपकरणों की मदद से खोला गया. आरोप है कि वहां से नीट – परीक्षा के प्रश्नपत्रों की तस्वीरें ली गईं और उनके हल तैयार कर अभ्यर्थियों तक पहुंचाए गए. उसी दिन देशभर में 23 लाख से अधिक छात्र परीक्षा में शामिल हुए थे बाद में आरोप सामने आए कि परीक्षा के दौरान बड़ी संख्या में उम्मीदवारों को अवैध तरीके से प्रश्नपत्र और उत्तर उपलब्ध कराए गए थे. इस खुलासे ने देश की सबसे महत्वपूर्ण मेडिकल प्रवेश परीक्षा की विश्वसनीयता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए.
मामले के सामने आने के बाद केंद्रीय जांच ब्यूरो ने व्यापक जांच शुरू की. जांच के दौरान कई चार्जशीट दाखिल की गईं और लगभग 45 आरोपियों के नाम सामने आए. एजेंसियों ने 144 कथित लाभार्थियों की पहचान भी की. जांच में कई गिरफ्तारियां हुईं, जिनमें रॉकी उर्फ राकेश रंजन जैसे कथित सरगना और बाद में पकड़े गए कथित मास्टरमाइंड संजीव कुमार सिंह उर्फ संजीव मुखिया भी शामिल थे. संजीव मुखिया पर तीन लाख रुपये का इनाम घोषित था और वह परीक्षा के लगभग एक वर्ष बाद तक फरार रहा था. इसके बावजूद 2026 के मध्य तक इस मामले में किसी भी आरोपी को अदालत से दोषी घोषित नहीं किया जा सका है.
नीट- मामले में जांच एजेंसियों ने बड़े पैमाने पर सबूत जुटाने का दावा किया है, लेकिन मुकदमे की प्रक्रिया अब भी जारी है. अधिकांश आरोपी या तो न्यायिक हिरासत में हैं या जमानत पर बाहर हैं. जांच में जिन लोगों की भूमिका सामने आई, उनके खिलाफ कानूनी कार्रवाई चल रही है, लेकिन अब तक किसी को अंतिम रूप से दोषी नहीं ठहराया गया. आलोचकों का कहना है कि जिस नेटवर्क ने कथित रूप से पेपर लीक को संभव बनाया, उसके शीर्ष स्तर तक जांच अभी भी पूरी तरह नहीं पहुंच पाई है.
भारत में पेपर लीक की समस्या कोई नई नहीं है. संसदीय चर्चाओं और मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, वर्ष 20 15 से 2023 के बीच आठ राज्यों में सरकारी भर्ती परीक्षाओं के 50 से अधिक पेपर लीक मामले सामने आए. इन घटनाओं से करीब 1.4 करोड़ अभ्यर्थियों का भविष्य प्रभावित हुआ. यदि नीट और बिहार शिक्षक भर्ती जैसी राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं को भी शामिल कर लिया जाए तो यह संख्या और अधिक बढ़ जाती है. बार-बार होने वाले पेपर लीक ने भर्ती और प्रवेश परीक्षाओं की विश्वसनीयता को गंभीर नुकसान पहुंचाया है.
राजस्थान पेपर लीक मामलों का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा. वर्ष 2011 से 2022 के बीच राज्य में 26 पेपर लीक की घटनाएं दर्ज हुईं, जिनमें से 14 घटनाएं केवल अंतिम चार वर्षों में हुईं. इसका मतलब है कि औसतन हर साल तीन से अधिक बार परीक्षा प्रणाली में सेंध लगी. गुजरात में 2015 के बाद 14 मामले सामने आए, जबकि उत्तर प्रदेश में 2017 से 2022 के बीच छह बड़े पेपर लीक दर्ज किए गए. उत्तराखंड में 2019 के बाद चार प्रमुख घटनाएं सामने आईं. यह आंकड़े बताते हैं कि समस्या किसी एक राज्य तक सीमित नहीं है.



