– महार भूस्वामियों का हक़ छिना? — 272 मूल मालिकों को ज़मीन लौटाने की माँग
नागपुर :- राज्य में चल रहे पुणे के ज़मीन सौदे के मामले में ख़रीद-फ़रोख़्त का लेन-देन अवैध है। महाराष्ट्र लघु ग्राम भूमि अधिनियम, 1969 के अनुसार, ये ज़मीनें मूल मालिकों को सौंपी जानी चाहिए। इसके अलावा, सरकार इस ज़मीन की मालिक नहीं है, और इसके लिए तैयार किया गया पावर ऑफ़ अटॉर्नी भी अवैध है, ऐसा सामाजिक न्याय विभाग के पूर्व प्रधान सचिव किशोर गजभिये ने दावा किया है। वे रविवार को पत्रकारों से बात कर रहे थे।
चूँकि यह महार ज़मीन से जुड़ा मामला है, इसलिए गजभिये ने एक प्रेस विज्ञप्ति के ज़रिए इस मामले से जुड़े कुछ तथ्य मीडिया के सामने पेश किए। इसके अनुसार, इस ज़मीन के लेन-देन में कई अवैध चीज़ें हुई हैं। इस ज़मीन के मूल मालिक 272 महार ज़मीन मालिक हैं, और मुंबई सरकार या महाराष्ट्र सरकार इस ज़मीन की मालिक नहीं है।
यह कहना ग़लत है कि यह ज़मीन महाराष्ट्र सरकार की है। इस ज़मीन के 7/12 भाग पर “मुंबई सरकार” के रूप में की गई प्रविष्टि ग़लत है। महार भूस्वामियों की ज़मीन पावर ऑफ़ अटॉर्नी के ज़रिए हासिल या बेची नहीं जा सकती। इसलिए शीतल तेजवानी की पावर ऑफ़ अटॉर्नी शुरू से ही अमान्य है। साथ ही, इस ज़मीन का लेन-देन अमीडिया एंटरप्राइजेज कंपनी के ज़रिए हुआ था और इस कंपनी के साझेदार पार्थ पवार और दिग्विजय पाटिल हैं। उनका ख़रीद-फ़रोख़्त लेन-देन भी शुरू से ही अमान्य है। इसलिए, सरकार को इस ज़मीन के सभी लेन-देन और सभी हस्तांतरण रद्द कर देने चाहिए और इसे महाराष्ट्र कन्निशी ग्राम भूमि स्वामित्व अधिनियम, 1969 के अनुसार उन 272 मूल भूस्वामियों को सौंप देना चाहिए जो अभी भी जीवित हैं। इससे महार भूस्वामी अधिनियम का उल्लंघन नहीं होगा और मूल भूस्वामियों को न्याय मिलेगा, ऐसा गजभिये कहते हैं।








