– “अग्रवाल रेत सिंडिकेट” बना रेत के खेल का कथित ‘किंगपिन’?
– कैमरे लगे, फिर भी अंधेरा क्यों? माइनिंग ऑफिस में रियल-टाइम मॉनिटरिंग क्यों नहीं?
नागपुर /परशिवनी :- नागपुर जिले में इन दिनों रेत माफियाओं का तांडव चरम पर है। परशिवनी तहसील अंतर्गत न्यू वाघोडा पर बड़े पैमाने पर अवैध उत्खनन की गंभीर जानकारी सामने आ रही है। हैरत की बात यह है कि न्यू वाघोडा का विधिवत लिलाव तक नहीं हुआ, फिर भी पोकलेन और जेसीबी मशीनों से दिन-रात रेत निकाली जा रही है जानकरी सामने आ रही है ।
स्थानीय सूत्रों के मुताबिक रेत यहां से उठाई जा रही है, लेकिन रॉयल्टी पर्ची किसी अन्य अधिकृत घाट की फाड़ी जा रही है। यानी चोरी एक जगह, कागजों में वैधता दूसरी जगह। यह सीधा-सीधा शासन को करोड़ों के राजस्व का चूना लगाने का संगठित खेल है।
जिल्हा खनिज विभाग , पुलिस और महसूल विभाग पर सवाल – जब आम नागरिकों को मशीनों से हो रहा उत्खनन साफ दिखाई दे रहा है, तो क्या खनिज विभाग, पुलिस और महसूल विभाग को यह नजर नहीं आता? शिकायतों के बावजूद “हाथों से उत्खनन” बताकर मामलों को ठंडे बस्ते में डाल दिया जाना कई संदेह पैदा करता है। क्या स्पॉट पंचनामा महज औपचारिकता बनकर रह गया है? प्रशासन ओवरलोडिंग पर सख्ती की बात करता है, लेकिन 10 और 12 चक्का वाहनों में 10-10 टन अतिरिक्त रेत भरकर खुलेआम परिवहन हो रहा है। चर्चा है कि इस पूरे खेल में पुलिस की भी मौन सहमति है, जिससे रेत माफियाओं के हौसले बुलंद हैं।
अब खेल और भी “स्मार्ट” हो चुका है। सूत्रों का दावा है कि एक ही रॉयल्टी पर 2 से 3 ट्रिप बिना रॉयल्टी के निकाली जा रही हैं। चर्चा है की जिन घाटों की सीमा से महज 20 किमी तक परिवहन होना चाहिए, वहां 150–200 किमी दूर की रॉयल्टी फाड़ी जा रही है। GPS सिस्टम होने के बावजूद लोकेशन से कथित छेड़छाड़ कर कई ट्रिप “मैनेज” की जा रही हैं। सवाल उठता है—क्या GPS डेटा की निगरानी प्रभावी नहीं है या जानबूझकर अनदेखी की जा रही है? यदि शासन चाहे तो रियल-टाइम GPS ट्रैकिंग, केंद्रीकृत CCTV मॉनिटरिंग और ऑनलाइन रॉयल्टी वेरिफिकेशन से रेती चोरी पर लगाम लगाई जा सकती है। अब सबसे बड़ा सवाल—क्या प्रशासन इस कथित सिंडिकेट पर कठोर कार्रवाई करेगा, या फिर मधुर संबंध के आगे कानून बेबस रहेगा? जनता जवाब चाहती है।
CCTV अनिवार्य, फिर भी नियंत्रण नहीं
घाटों पर CCTV लगाना अनिवार्य है। तो क्या सभी कैमरों का सीधा एक्सेस माइनिंग ऑफिस को नहीं दिया जा सकता? आज के हाईटेक दौर में रियल-टाइम मॉनिटरिंग संभव है। यदि शासन चाहे तो केंद्रीकृत कंट्रोल रूम बनाकर हर ट्रक, हर रॉयल्टी और हर GPS मूवमेंट को ऑनलाइन ट्रैक किया जा सकता है। फिर भी सवाल वही—इच्छाशक्ति की कमी या सिस्टम की मिलीभगत?
“अग्रवाल रेत सिंडिकेट” की चर्चा से गरमाया बाजार
इन दिनों भंडारा, गोंदिया और चंद्रपुर सहित कई जिलों में “अग्रवाल” नाम से जुड़े एक कथित रेत सिंडिकेट की चर्चा जोरों पर है। यह भी चर्चा है कि संबंधित व्यक्ति की राजनीतिक पहुंच मजबूत है और वह किसी प्रभावशाली मंत्री का करीबी माना जाता है। इसी कथित संरक्षण के चलते घाटों पर सख्त कार्रवाई नहीं हो पाती ऐसा आरोप लगाया जा रहा है? हालांकि इन दावों की कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है लेकिन जनचर्चा ने पूरे प्रकरण को राजनीतिक रंग दे दिया है। सूत्र बताते हैं कि अवैध उत्खनन में लिप्त कुछ लोग राजनितिक पक्ष के नेताओं के नाम का दुरुपयोग कर अधिकारियों को कार्रवाई न करने की चेतावनी देते हैं। तबादले की धमकियों की भी चर्चा है। यदि यह सच है, तो यह केवल राजस्व चोरी का मामला नहीं, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को चुनौती है।
जनता के सवाल, जवाब कौन देगा?
– एक रॉयल्टी पर 2–3 ट्रिप कैसे निकल रही हैं?
– GPS से छेड़छाड़ किसके संरक्षण में?
– CCTV फुटेज का सीधा एक्सेस माइनिंग विभाग को क्यों नहीं?
– ओवरलोड ट्रकों पर सख्त कार्रवाई कब?




