– ‘सिविल’ के काम में ‘CHP’ का तड़का; क्या ₹18 करोड़ के टेंडर में चहेते ठेकेदार के लिए बिछाई गई बिसात?
चंद्रपुर :- चंद्रपुर महाऔष्णिक विद्युत केंद्र (CSTPS) एक बार फिर अपनी विवादित टेंडर प्रक्रियाओं को लेकर चर्चा में है। ताजा मामला ₹18 करोड़ की लागत से बनने वाले आर.सी.सी(RCC) प्लेटफॉर्म के निर्माण का है। कागजों पर यह एक साधारण सिविल इंजीनियरिंग का काम दिख रहा है, लेकिन टेंडर की शर्तों के भीतर एक ऐसी ‘कंडीशन’ छिपी है, जिसने पूरी निष्पक्षता पर सवालिया निशान लगा दिया है।
इस टेंडर का मुख्य उद्देश्य कोयला भंडारण और परिवहन के लिए RCC प्लेटफॉर्म बनाना है। तकनीकी रूप से, RCC प्लेटफॉर्म बनाना पूरी तरह से सिविल इंजीनियरिंग का हिस्सा है, जिसमें कंक्रीट, सरिया और निर्माण विशेषज्ञता की जरूरत होती है।
पेच यहाँ है:
टेंडर की शर्तों में जानबूझकर यह अनिवार्य कर दिया गया है कि बोली लगाने वाले ठेकेदार के पास CHP से संबंधित काम का पिछला अनुभव होना चाहिए।
सवाल:
जब काम सीमेंट-कंक्रीट का ढांचा खड़ा करना है, तो उसमें ‘कोयला हैंडलिंग’ की मशीनों या प्लांट चलाने के अनुभव की क्या तुक है?
. ‘बाहर’ करने की साजिश?
इस एक ‘तकनीकी शर्त’ ने खेल को पूरी तरह बदल दिया है:
सामान्य ठेकेदार रेस से बाहर: शहर के बड़े और अनुभवी सिविल कांट्रैक्टर, जो दशकों से निर्माण कार्य कर रहे हैं, वे इस शर्त के कारण ‘अपात्र’ हो गए हैं।
मैदान साफ: अब रेस में केवल वही 2-3 कंपनियां बची हैं, जिनके पास CHP का अनुभव है। आरोप है कि यह शर्त केवल एक ‘खास ठेकेदार’ को फायदा पहुँचाने के लिए ‘कस्टमाइज’ की गई है।
‘समान काम’ के नियम की धज्जियां
सरकारी नियमों के अनुसार, टेंडर की शर्तें ‘समान प्रकृति के कार्य’ ( पर आधारित होनी चाहिए।
प्रशासन का तर्क है कि काम CHP एरिया के भीतर है, इसलिए अनुभव भी वही चाहिए।
लेकिन जानकारों का कहना है कि एरिया कहीं भी हो, काम का स्वरूप ही अनुभव का आधार होना चाहिए। सिविल वर्क के लिए मैकेनिकल या ऑपरेशनल अनुभव मांगना नियमों का उल्लंघन है।
संदेह के घेरे में पारदर्शिता
इस पूरी प्रक्रिया से भ्रष्टाचार और मिलीभगत की बू आ रही है। चर्चा है कि:
क्या टेंडर जारी होने से पहले ही ‘विजेता’ का नाम तय हो चुका था?
क्या महाजेनको के वरिष्ठ अधिकारियों की शह पर यह ‘शर्तों का जाल’ बुना गया है?
यह मामला सीधे तौर पर सार्वजनिक धन के दुरुपयोग और टेंडर फिक्सिंग की ओर इशारा करता है। यदि इस शर्त को नहीं हटाया गया, तो यह स्पष्ट हो जाएगा कि प्रशासन निष्पक्ष टेंडर प्रक्रिया के बजाय ‘जी-हुजूरी’ और ‘कमीशनखोरी’ को बढ़ावा दे रहा है।




