Friday, May 1, 2026
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सुनील केदार का ग्रामीण क्षेत्रों में दबदबा बरकरार, भाजपा की गुटबाजी ने बढ़ाई मुश्किलें?

– केदार के असर के सामने भाजपा बेअसर, कुंभारे के नेतृत्व पर उठे बड़े सवाल

नागपुर /सावनेर :- नागपुर जिले की राजनीति में हाल ही में संपन्न हुए ग्राम पंचायत उपचुनावों ने सत्ता के गलियारों में हलचल तेज कर दी है। इन नतीजों ने साफ कर दिया है कि ग्रामीण मतदाताओं का भरोसा आज भी पूर्व मंत्री सुनील केदार पर अटूट है। वहीं दूसरी ओर, भाजपा के भीतर मची अंदरूनी कलह और गुटबाजी पार्टी के लिए आगामी जिला परिषद और पंचायत समिति चुनावों में खतरे की घंटी साबित हो रही है।

केदार गुट की शानदार जीत, भाजपा को ‘सेमीफाइनल’ में झटका – 28 अप्रैल को हुए मतदान और 29 अप्रैल को आए नतीजों ने सावनेर विधानसभा में केदार समर्थित उम्मीदवारों की जीत का परचम लहराया है। केलवद जैसी महत्वपूर्ण ग्राम पंचायत के सरपंच पद पर केदार गुट के कैलास गांधी ने भाजपा समर्थित सचिन ढोबले को 353 वोटों से करारी शिकस्त दी। इसी तरह हत्तीसरा में भी बेहद रोमांचक मुकाबले में केदार समर्थित अनिल गुडघे ने जीत दर्ज की।

भाजपा की गुटबाजी: मनोहर कुंभारे बनाम आशीष देशमुख

चर्चा है कि सावनेर विधानसभा क्षेत्र में भाजपा दो फाड़ नजर आ रही है। एक ओर विधायक डॉ. आशीष देशमुख के साथ पुराने निष्ठावान कार्यकर्ता खड़े दिख रहे हैं, तो दूसरी ओर काटोल के जिला अध्यक्ष मनोहर कुंभारे का अपना अलग गुट सक्रिय है। केलवद जिला परिषद सर्किल के परिणामों में इस गुटबाजी का सीधा असर देखा गया। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि पुराने कार्यकर्ताओं को नजरअंदाज करना भाजपा को भारी पड़ रहा है, जिसका सीधा फायदा सुनील केदार की झोली में जा रहा है। सरपंच पद (कांग्रेस समर्थित): केलवद (कैलास गांधी), हत्तीसरा (अनिल गुडघे), बोखारा (रणजीत सिंह चौहान), पाठगोवरी (अजय मडावी)। भिवापुर क्षेत्र कांग्रेस ने अड्याल, टाका और नवेगांव देशमुख में सरपंच पद पर कब्जा जमाया। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि इन उपचुनावों के नतीजे महज स्थानीय चुनाव नहीं बल्कि आने वाले जिला परिषद चुनावों के लिए एक ट्रेलर हैं। यदि भाजपा ने हिंगना ,काटोल और सावनेर क्षेत्र में अपनी गुटबाजी पर लगाम नहीं लगाई, तो सुनील केदार का ‘केडर’ ग्रामीण इलाकों में भाजपा का सूपड़ा साफ कर सकता है। हिंगना विधानसभा में भाजपा की करारी हार और जलालखेड़ा के आरंभी में राकांपा (शरद पवार गुट) की जीत ने यह स्पष्ट कर दिया है कि “ट्रिपल इंजन सरकार” के खिलाफ ग्रामीण अंचल में नाराजगी बढ़ रही है। ये नतीजे बताते हैं कि ग्रामीण जनता का विश्वास आज भी सुनील केदार के नेतृत्व में है। भाजपा की अंदरूनी खींचतान उन्हें आगामी चुनावों में जिला परिषद की सत्ता से दूर कर सकती है।

मनोहर कुंभारे के नेतृत्व में ढह रही भाजपा?

चर्चा है कि सावनेर विधानसभा, जिसे कभी आशीष देशमुख की जीत के बाद भाजपा का अभेद किला माना जाता था, आज उसी किले में दरारें खुलकर सामने आ रही हैं। और सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि इन दरारों की जड़ कहीं न कहीं सीधे तौर पर जिला अध्यक्ष मनोहर कुंभारे का कमजोर और विवादित नेतृत्व तो नहीं?

Ø राजनीतिक हलकों में चर्चा है कि:

• हिंगना, काटोल और सावनेर विधानसभा में भाजपा अब एकजुट संगठन नहीं, बल्कि टकराते गुटों का मैदान बन चुकी है।

• एक गुट पूरी ताकत से आशीष देशमुख, चरणसिंह ठाकुर और समीर मेघे के साथ खड़ा है।

• जबकि दूसरा गुट मनोहर कुंभारे के इशारों पर अलग रणनीति चलाकर संगठन को भीतर से कमजोर कर रहा है?

राजनीतिक हलकों में अब खुलकर कहा जा रहा है कि यह साधारण मतभेद नहीं, बल्कि नेतृत्व की विफलता का खुला उदाहरण है। सूत्रों के मुताबिक, आरोप यह तक लग रहे हैं कि कुंभारे की कार्यशैली ने न सिर्फ कार्यकर्ताओं को बांटा, बल्कि भाजपा के मजबूत गढ़ को भी खोखला कर दिया? क्या सावनेर विधानसभा सहित काटोल जिला अध्यक्ष के नेतृत्व में भाजपा की गिरती हालत महज संयोग है, या फिर यह सब मनोहर कुंभारे की गलत रणनीति और कमजोर नेतृत्व का नतीजा है या कुछ और है? अगर हालात ऐसे ही रहे, तो आने वाले जिल्हा परिषद और पंचायत समिति के चुनावों में यह “अंदरूनी जंग” भाजपा के लिए सबसे बड़ा खतरा बन सकती है।

चुनाव में दिखी अंदरूनी फूट, बड़ा सवाल जिम्मेदार कौन?

सूत्रों के मुताबिक केलवद जिला परिषद सर्किल के ग्राम पंचायत उपचुनाव ने भाजपा की अंदरूनी गुटबाजी को पूरी तरह उजागर कर दिया है बताया जा रहा है कि उम्मीदवार चयन को लेकर भारी मतभेद सामने आए, अलग-अलग गुटों ने अपनी-अपनी रणनीति अपनाई और इसका सीधा नुकसान पार्टी को उठाना पड़ा। साफ तौर पर कहा जा रहा है कि “घर की लड़ाई” ने भाजपा को चुनावी मैदान में कमजोर कर दिया। अब सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि इस पूरी स्थिति के लिए जिम्मेदार कौन है?क्या मनोहर कुंभारे संगठन को संभालने में नाकाम रहे? क्या गुटबाजी पर समय रहते नियंत्रण नहीं किया गया? या फिर यह सब अंदरूनी राजनीति का परिणाम है? इन सवालों के जवाब भले ही अभी साफ न हों, लेकिन संकेत स्पष्ट हैं — सावनेर विधानसभा में भाजपा की पकड़ कमजोर होती नजर आ रही है, जो आने वाले चुनावों के लिए खतरे की घंटी मानी जा रही है।


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