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लंदन स्ट्रीट से अचानक 5० पेड़ गायब

– क्या धरती निगल गई या चोरी हो गए?

नागपुर :- जयप्रकाश नगर शनिवार बाज़ार रोड—जिसे अलग-अलग नामों से ‘ऑरेंज स्ट्रीट’ या ‘लंदन स्ट्रीट’’ भी कहा जाता है—जो उप-राजधानी के दक्षिण-पश्चिम निर्वाचन क्षेत्र में स्थित है, आजकल कई कारणों से सुर्खियों में है. नागपुर मनपा को हाल ही में एक आवेदन मिला, जिसमें इस सडक़ के पास स्थित प्लॉट नंबर 3 पर लगे लगभग 138 पेड़ों को काटने की अनुमति मांगी गई थी. इस संख्या में 22 ऐसे पेड़ भी शामिल हैं जिन्हें विरासत पेड़ घोषित किया गया है. 23 अप्रैल को, मनपा ने एक सार्वजनिक सूचना जारी कर इस प्रस्ताव के संबंध में आपत्तियां आमंत्रित कीं, और इस मामले पर जल्द ही एक सार्वजनिक सुनवाई होने की उम्मीद है.

पेड़ों को काटने के इस प्रस्तावित कदम के विरोध में, स्थानीय निवासियों और सामाजिक संगठनों ने 1० मई को चिपको आंदोलन जैसा विरोध प्रदर्शन करने की घोषणा की. हालांकि, जब वे वहां पहुंचे, तो उन्होंने पाया कि पूरी जगह को नालीदार टिन की चादरों से पूरी तरह से घेर दिया गया था. नतीजतन, नागरिकों ने घेराबंदी वाली जगह के ठीक बाहर लगे पेड़ों के पास अपना विरोध प्रदर्शन किया.

इसके बाद, 17 मई को, नागरिकों ने एक मानव श्रृंखला बनाई और मनपा के वृक्ष विभाग को एक औपचारिक मांग पत्र सौंपा, जिसमें परिसर का मौके पर जाकर निरीक्षण करने का अनुरोध किया गया था.

2० मई को, मनपा के उद्यान विभाग के अधिकारियों, वृक्ष समिति के सदस्यों, ठेकेदार और आपत्ति दर्ज कराने वालों द्वारा एक संयुक्त निरीक्षण किया गया. उन्होंने वहां जो स्थिति देखी, वह हैरान करने वाली थी. सार्वजनिक सूचना में विशेष रूप से जिन 22 विरासत पेड़ों का ज़िक्र किया गया था, उनमें से मौके पर केवल 5 या 6 पेड़ ही मौजूद पाए गए. जिन पेड़ों पर नंबर डाले गए थे, उनमें सबसे बड़ा नंबर 88 पाया गया. जिसका अर्थ है कि मूल आवेदन में सूचीबद्ध 138 पेड़ों में से, चौंकाने वाली संख्या में 5० पेड़ मौके से गायब थे. वे बस अचानक लुप्त हो गए थे—और यह सब निर्धारित सार्वजनिक सुनवाई होने से पहले ही हो गया था.

बाकी बचे पेड़ों में से, तीन पेड़ या तो पूरी तरह से कटे हुए, आंशिक रूप से टूटे हुए, या आग से झुलसे हुए पाए गए. इसके अलावा, कई पेड़ों पर पहचान के लिए कोई नंबर ही नहीं था. सबसे खास बात यह है कि—इसके बावजूद कि पेड़ों में कीलें ठोकना कानून के तहत एक दंडनीय अपराध है. पहचान टैग (जिन पर उनके नंबर लिखे थे) लगाने के लिए कई पेड़ों में कीलें ठोक दी गई थीं. यह भी देखा गया कि आस-पास के पेड़ों के चारों ओर जान-बूझकर उखड़ी हुई डामर की परत और मलबा जमा कर दिया गया था.

चूंकि सार्वजनिक सूचना में सूचीबद्ध 138 पेड़ों में से 5० पेड़ मौके पर नहीं मिले, इसलिए नागरिकों ने बार-बार मांग की कि मौके पर जाकर निरीक्षण किया जाए. हालांकि, अधिकारियों ने लगातार इस मांग को नजरअंदाज कर दिया.. नागरिकों को लगता है कि अधिकारियों का यह जवाब—‘हम *पंचनामा दफ्तर में करेंगे’केवल अपनी जिम्मेदारी से बचने का एक बहाना है. नतीजतन, अधिकारियों के पूरे रवैये को लेकर संदेह पैदा हो गया है, और उनके इस बर्ताव से नागरिकों में गहरा रोष फैल गया है. जब हाई कोर्ट में एक याचिका पहले से ही लंबित है, तो ऐसे में पेड़ विभाग द्वारा नोटिस जारी करना और जन सुनवाई आयोजित करना कितना उचित है.

इस मामले का सबसे गंभीर पहलू जिसकी कड़ी आलोचना हो रही है, वह यह है ‘लंदन स्ट्रीट प्रोजेक्ट’ के संबंध में सार्वजनिक सूचना जारी करना और जल्दबाज में जनसुनवाई आयोजित करना, जबकि इसी प्रोजेक्ट से जुड़ी एक याचिका बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ के समक्ष पहले से ही लंबित है. इसे न केवल जनता के विश्वास के साथ धोखा माना जा रहा है, बल्कि इसे कोर्ट को गुमराह करने की एक कोशिश के तौर पर भी देखा जा रहा है.

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