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नैनो खरीदो, तभी मिलेगा यूरियाखाद कंपनियों की मनमानी; तंत्रकी मौन सहमति

यासीन शेख, गोंदिया :- जिले में पिछले कई वर्षों से खाद कंपनियों की मनमानी जारी है। इसके कारण खुदरा विक्रेताओं को यूरिया की आपूर्ति प्राप्त करने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। कंपनियों द्वारा 3 टन यूरिया लेने पर एक पेटी नैनो यूरिया तथा 5 टन यूरिया लेने पर एक पेटी नैनो डीएपी लेने के लिए बाध्य किया जा रहा है। जिले में यह मामला खुलेआम चल रहा है, बावजूद इसके संबंधित अधिकारी आंखें मूंदे हुए हैं। परिणामस्वरूप खुदरा विक्रेताओं को कंपनियों की मनमानी का शिकार होना पड़ रहा है।

जिले में खाद कंपनियों की मनमानी लगातार जारी है। इस संबंध में शिकायतें किए जाने के बावजूद कोई ठोस कार्रवाई नहीं हो रही है। उलटे शिकायत करने वाले खुदरा विक्रेता की यूरिया आपूर्ति ही बंद कर दी गई है। कृषि विभाग द्वारा जिले में खाद आपूर्ति के अनुसार तहसीलवार आवंटन के निर्देश जारी किए जाते हैं, लेकिन थोक विक्रेता और खाद निर्माता कंपनियां इन निर्देशों की अनदेखी कर अपनी शर्तों पर ही यूरिया की आपूर्ति कर रही हैं।

3 टन यूरिया पर एक पेटी नैनो यूरिया या 5 टन यूरिया पर एक पेटी नैनो डीएपी लेने की शर्त अनिवार्य कर दी गई है। जो खुदरा विक्रेता कंपनियों की शर्तें मानता है, उसे ही यूरिया की आपूर्ति दी जाती है। यदि कोई विक्रेता लिंकिंग (अनिवार्य खरीद) का विरोध करता है, तो उसकी आपूर्ति रोक दी जाती है।

शिकायतकर्ता को बंद की आपूर्ति

करीब एक वर्ष पूर्व एक खुदरा खाद विक्रेता ने कंपनी द्वारा की जा रही लिंकिंग तथा अनाधिकृत भंडारण के खिलाफ शिकायत दर्ज कराई थी। इसके बाद संबंधित कंपनी और थोक विक्रेता द्वारा उस शिकायतकर्ता की यूरिया आपूर्ति बंद कर दी गई। इस संबंध में उसने कृषि विभाग में भी शिकायत की, लेकिन अधिकारियों ने कोई कार्रवाई नहीं की। इससे विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठने लगे हैं।

अधिकारियों को शिकायत का इंतजार

लिंकिंग के मुद्दे पर कृषि अधीक्षक निलेश कनवड़े से पूछताछ करने पर उन्होंने कहा कि उनके पास इस संबंध में कोई शिकायत प्राप्त नहीं हुई है। शिकायत मिलने पर संबंधित कंपनी पर कार्रवाई की जाएगी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब जिले में खुलेआम लिंकिंग के जरिए खाद बिक्री हो रही है, तो कृषि विभाग इससे अनभिज्ञ कैसे है?

जिले के खुदरा विक्रेता मजबूरी में खाद कंपनियों की मनमानी और दबाव सहने को विवश हैं। विभागीय उदासीनता के कारण कंपनियों को अप्रत्यक्ष रूप से संरक्षण मिल रहा है, ऐसी चर्चा बाजार में  जोरों पर है।

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