– सूखते कुएं, घटता भूजल और बढ़ता कंक्रीट: पर्यावरण संतुलन पर गहराता संकट
हर वर्ष 5 जून को मनाया जाने वाला विश्व पर्यावरण दिवस हमें प्रकृति के प्रति हमारी जिम्मेदारियों का स्मरण कराता है, लेकिन आज की वास्तविकता इस अवसर को केवल औपचारिकता तक सीमित नहीं रहने देती। चारों ओर तेजी से बदलता पर्यावरण एक गंभीर चेतावनी दे रहा है। कभी जीवन का आधार रहे कुएं आज या तो सूख चुके हैं या कंक्रीट के नीचे दबा दिए गए हैं। परंपरागत जल स्रोतों की उपेक्षा और आधुनिक विकास की अंधी दौड़ ने प्राकृतिक संतुलन को गहराई से प्रभावित किया है।
एक समय था जब गांवों और शहरों में कुएं केवल जल का साधन नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक जीवन का केंद्र हुआ करते थे। ये कुएं वर्षा जल को संचित कर भूजल स्तर को बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते थे। लेकिन जैसे-जैसे शहरीकरण बढ़ा, इन कुओं को या तो पाट दिया गया या उन्हें अनुपयोगी मानकर छोड़ दिया गया। इसका परिणाम यह हुआ कि भूजल का प्राकृतिक पुनर्भरण बाधित हो गया और आज हम जल संकट के मुहाने पर खड़े हैं।
भूजल स्तर में लगातार गिरावट आज देश के लिए एक गंभीर चिंता का विषय बन चुकी है। अत्यधिक बोरवेल और ट्यूबवेल के उपयोग, वर्षा जल के जमीन में समाने की घटती क्षमता और जल संरक्षण की पारंपरिक प्रणालियों के खत्म होने से स्थिति दिन-ब-दिन बिगड़ती जा रही है। कई शहरों और गांवों में पानी की उपलब्धता संकटग्रस्त हो चुकी है और भविष्य में “डे-ज़ीरो” जैसी परिस्थितियों की आशंका भी व्यक्त की जा रही है।
इस संकट को और गहरा बना रहा है ग्लोबल वार्मिंग, जिसके कारण तापमान में निरंतर वृद्धि हो रही है। अनियमित मानसून, अत्यधिक गर्मी, सूखा और अचानक बाढ़ जैसी घटनाएं अब सामान्य होती जा रही हैं। शहरों में “हीट आइलैंड” प्रभाव बढ़ता जा रहा है, जहां कंक्रीट और डामर के कारण तापमान आसपास के क्षेत्रों से अधिक हो जाता है। यह स्थिति न केवल पर्यावरण बल्कि मानव स्वास्थ्य के लिए भी खतरा बनती जा रही है।
तेजी से बढ़ते शहरीकरण ने पेड़ों की संख्या में भी भारी कमी ला दी है। सड़क चौड़ीकरण, नई इमारतों और विकास परियोजनाओं के नाम पर हजारों पेड़ काटे जा रहे हैं, जबकि उनकी भरपाई के लिए पर्याप्त वृक्षारोपण नहीं हो रहा। पेड़ों की कमी से न केवल ऑक्सीजन का स्तर प्रभावित हो रहा है, बल्कि तापमान में वृद्धि और जैव विविधता के नुकसान जैसी समस्याएं भी सामने आ रही हैं। शहरों की हरियाली धीरे-धीरे समाप्त होती जा रही है और उसकी जगह कंक्रीट का जंगल फैलता जा रहा है।
कंक्रीट के बढ़ते विस्तार ने जमीन की जल सोखने की क्षमता को लगभग समाप्त कर दिया है। बारिश का पानी अब जमीन में समाने के बजाय सीधे नालों और सीवर में बह जाता है। इससे जहां एक ओर भूजल स्तर गिरता है, वहीं दूसरी ओर अचानक बाढ़ जैसी समस्याएं भी उत्पन्न होती हैं। यह स्थिति स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि विकास और पर्यावरण के बीच संतुलन कहीं न कहीं बिगड़ चुका है।
इन सभी परिस्थितियों का संयुक्त प्रभाव अत्यंत चिंताजनक है। बढ़ता तापमान, जल संकट, प्राकृतिक आपदाओं की आवृत्ति में वृद्धि और जीवन की गुणवत्ता में गिरावट यह संकेत देते हैं कि यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में यह संकट और भी विकराल रूप ले सकता है।
समाधान की दिशा में हमें अपनी पारंपरिक जल संरचनाओं की ओर लौटना होगा। पुराने कुओं और तालाबों का पुनर्जीवन, वर्षा जल संचयन को अनिवार्य बनाना, बड़े पैमाने पर वृक्षारोपण और शहरी नियोजन में पर्यावरणीय संतुलन को प्राथमिकता देना अत्यंत आवश्यक है। साथ ही, जन जागरूकता और सामूहिक सहभागिता के बिना इस समस्या का समाधान संभव नहीं है।
अंततः, यह समझना आवश्यक है कि पर्यावरण केवल एक विषय नहीं, बल्कि हमारे अस्तित्व का आधार है। कुएं, पेड़ और जल स्रोत हमारी धरोहर हैं, जिन्हें संरक्षित करना हमारी जिम्मेदारी है। विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर यह संकल्प लेना होगा कि हम विकास के साथ-साथ प्रकृति के संतुलन को भी बनाए रखेंगे, तभी एक सुरक्षित और स्वस्थ भविष्य सुनिश्चित किया जा सकेगा।
– डॉ. प्रवीण डबली जल योद्धा, जल अभ्यासक, पर्यावरण प्रेमी








