– मोतीबाग के ऐतिहासिक कुएं के पुनर्जीवन के अनुभव को देशभर में लागू करने का सुझाव
नागपुर :- भारतीय रेलवे की भूमि एवं परिसरों में मौजूद ऐतिहासिक एवं पारंपरिक जलस्रोतों—कुओं, तालाबों, बावड़ियों, जलकुंडों तथा अन्य जल संरचनाओं—के संरक्षण, पुनर्जीवन एवं वर्षाजल संचयन के लिए राष्ट्रीय स्तर पर विशेष अभियान शुरू करने की मांग की गई है। इस संबंध में जल कार्यकर्ता एवं वरिष्ठ पत्रकार डॉ. प्रवीण डबली ने केंद्रीय रेल मंत्री अश्विनी वैष्णव को पत्र भेजकर “Railway Heritage Water Conservation Mission” शुरू करने का प्रस्ताव रखा है।
डॉ. डबली ने अपने पत्र में कहा है कि रेलवे देश के विकास का महत्वपूर्ण आधार होने के साथ-साथ पर्यावरण एवं जल संरक्षण में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। रेलवे के विशाल नेटवर्क और उपलब्ध भूमि का उपयोग पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण तथा वर्षाजल संचयन के लिए किया जाए तो यह पहल व्यापक जनअभियान का रूप ले सकती है।
उन्होंने बताया कि वर्ष 2010 से नागपुर एवं विदर्भ में रेलवे से संबंधित यात्री सुविधाओं, नए प्रकल्पों तथा क्षेत्रीय रेलवे विकास के विभिन्न विषयों पर वे लगातार प्रयासरत हैं। इसी क्रम में जल संरक्षण को जनभागीदारी से जोड़ते हुए “एक संस्था–एक कुआं/तालाब” की अवधारणा को आगे बढ़ाया जा रहा है।
मोतीबाग के ऐतिहासिक कुएं का दिया उदाहरण
डॉ. डबली ने रेलवे मंत्री को भेजे पत्र में नागपुर के मोतीबाग क्षेत्र स्थित लगभग 200 वर्ष पुराने विशाल ऐतिहासिक कुएं का उदाहरण देते हुए कहा कि जनसहयोग एवं मंडल रेल प्रबंधक दीपक कुमार गुप्ता के सहयोग से कुएं की सफाई एवं संरक्षण का कार्य किया गया। लगभग 72 बाय 72 फीट व्यास वाले इस कुएं में आज 4 करोड़ लीटर से अधिक पानी संग्रहित होने का उल्लेख करते हुए उन्होंने कहा कि यह उदाहरण साबित करता है कि पुराने जलस्रोत केवल ऐतिहासिक धरोहर नहीं, बल्कि पुनर्जीवन के बाद आज भी जल संरक्षण एवं भूजल संवर्धन के प्रभावी साधन बन सकते हैं।
राष्ट्रपति सचिवालय तक पहुंचा जल संरक्षण प्रस्ताव
डॉ. डबली ने पत्र में यह भी उल्लेख किया कि पारंपरिक जलस्रोतों के संरक्षण एवं “एक संस्था–एक कुआं/तालाब” जैसे सुझाव राष्ट्रपति महोदया के समक्ष भी प्रस्तुत किए गए हैं। उनके अनुसार राष्ट्रपति सचिवालय ने प्रस्तावों का संज्ञान लेते हुए इन्हें जल शक्ति मंत्रालय को भेजा है। इसी पहल को रेलवे से जोड़कर देशव्यापी अभियान शुरू करने का आग्रह किया गया है।
देशभर में सर्वेक्षण और GIS मैपिंग का सुझाव
प्रस्ताव के तहत रेलवे की भूमि एवं परिसरों में मौजूद सभी पुराने कुओं, तालाबों, बावड़ियों एवं अन्य पारंपरिक जलस्रोतों का सर्वेक्षण कर GIS Mapping करने का सुझाव दिया गया है। ऐतिहासिक एवं उपयोगी जलस्रोतों को अतिक्रमण, कचरे एवं प्रदूषण से मुक्त कर वैज्ञानिक तरीके से पुनर्जीवित करने तथा रेलवे स्टेशनों, कार्यालयों, कार्यशालाओं एवं कॉलोनियों की छतों से प्राप्त वर्षाजल को इन जलस्रोतों और recharge structures से जोड़ने की बात कही गई है।
हर प्रमुख स्टेशन पर जल धरोहर की अवधारणा
डॉ. डबली ने “One Railway Station–One Water Heritage” की अवधारणा लागू करने का सुझाव देते हुए कहा कि प्रत्येक प्रमुख रेलवे स्टेशन पर कम से कम एक पारंपरिक जलस्रोत को संरक्षित किया जा सकता है। सूखे अथवा अनुपयोगी पुराने कुओं को वैज्ञानिक मानकों के अनुसार groundwater recharge wells के रूप में विकसित करने तथा रेलवे परिसरों में rainwater harvesting और treated wastewater के पुन: उपयोग को बढ़ावा देने का भी प्रस्ताव रखा गया है।
जल धरोहर रजिस्टर बनाने की मांग
ऐतिहासिक जलस्रोतों पर Heritage Boards लगाकर यात्रियों एवं नई पीढ़ी को उनके इतिहास और जल संरक्षण के महत्व की जानकारी देने का सुझाव भी दिया गया है। इसके अलावा प्रत्येक रेलवे मंडल में “Water Heritage Register” तैयार करने तथा जलस्रोतों के संरक्षण की प्रगति की प्रतिवर्ष समीक्षा करने की मांग की गई है।
जनभागीदारी से बन सकता है राष्ट्रीय मॉडल
डॉ. डबली ने कहा कि रेलवे की भूमि, पारंपरिक जलस्रोत, वर्षाजल संचयन और जनभागीदारी को एक साथ जोड़कर “Railway as a Water Conservation Partner” की अवधारणा विकसित की जा सकती है। स्थानीय नागरिक संस्थाओं, स्वयंसेवी संगठनों, जल विशेषज्ञों एवं रेलवे कर्मचारियों को जोड़कर इनके संरक्षण एवं रखरखाव की स्थायी व्यवस्था बनाई जा सकती है।
उन्होंने रेल मंत्री से प्रस्ताव पर मंत्रालय स्तर पर विचार कर भारतीय रेलवे में “Railway Heritage Water Conservation Mission” शुरू करने की दिशा में आवश्यक कार्यवाही करने का आग्रह किया है। साथ ही नागपुर एवं विदर्भ में किए गए जल संरक्षण कार्यों तथा मोतीबाग के ऐतिहासिक कुएं के पुनर्जीवन के अनुभव के आधार पर अभियान का विस्तृत मॉडल प्रस्तुत करने की भी इच्छा व्यक्त की है।
डॉ. प्रवीण डबली ने कहा कि रेलवे यदि अपने परिसरों में मौजूद जल विरासत को संरक्षित करने की पहल करता है तो इससे जल संरक्षण के साथ-साथ देश की ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक धरोहरों के संरक्षण को भी नई दिशा मिल सकती है।
-डॉ प्रवीण डबली, वरिष्ठ पत्रकार








