– अरबों-खरबों के संभावित वित्तीय अंतर की आशंका? कोयला आपूर्ति के रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच की मांग?
– कोयले में काली मिट्टी, सफेद पत्थर और शेल मिलने के आरोपों से बढ़ी हलचल?
– शिव शंभू सिंह ने उठाए सवाल – महानिर्मिती द्वारा की गई शिकायतों पर कार्रवाई कहां है, जवाबदेही किसकी?
– CBI और SIT की संयुक्त जांच हुई तो सामने आ सकते हैं कोयला आपूर्ति से जुड़े बड़े राज!
नागपुर / विशेष प्रतिनिधि :- वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) से महाराष्ट्र राज्य विद्युत उत्पादन कंपनी (महानिर्मिती / MAHAGENCO) को होने वाली कोयला आपूर्ति की गुणवत्ता और पारदर्शिता एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है? खदानों से निकलने वाले कोयले के ग्रेड और बिजलीघरों में पहुँचने वाले कोयले की गुणवत्ता में जमीन-आसमान का अंतर मिलने के आरोप सामने आए हैं। इस पूरे मामले को लेकर प्रशासनिक और औद्योगिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। मामला सार्वजनिक क्षेत्र के दो प्रमुख उपक्रमों, आपूर्ति अनुबंधों और संभावित आर्थिक प्रभाव से जुड़ा होने के कारण निष्पक्ष जांच की मांग महत्वपूर्ण हो गई है।
सूत्रों से प्राप्त जानकारी के अनुसार, वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL) की खदानों से लोडिंग के समय कोयले का ग्रेड-10 दर्शाए जाने और महानिर्मिती (MAHAGENCO) के थर्मल पावर स्टेशनों पर प्राप्ति के बाद उसकी गुणवत्ता ग्रेड-15 या उससे नीचे पाए जाने को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं चर्चा है कि खदान के लोडिंग स्थल और बिजलीघर में प्राप्ति के समय की GCV (सकल ऊष्मीय मान) रिपोर्टों में 3 से 4 ग्रेड तक का अंतर सामने आया है। हालांकि, इस अंतर की वास्तविक स्थिति और उसके कारणों की पुष्टि के लिए संबंधित खेपों की रिपोर्टों, सैंपलिंग प्रक्रिया तथा प्रयोगशाला परिणामों का मिलान आवश्यक है।
चर्चा है कि इस संबंध में महानिर्मिती (MAHAGENCO) द्वारा संबंधित डब्लूसीएल को पत्र भेजे जाने की जानकारी भी सामने आई है। अब यह सवाल उठ रहा है कि यदि संबंधित पत्र प्राप्त हुए हैं, तो उन पर क्या कार्रवाई की गई और जांच की वर्तमान स्थिति क्या है। संबंधित दस्तावेजों और आधिकारिक पक्ष के सामने आने के बाद ही मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
कथित तौर पर, केवल कोयले के ग्रेड में अंतर का मामला ही नहीं, बल्कि बिजलीघरों में पहुंचने वाले कोयले में काली मिट्टी, सफेद पत्थर और सफेद शेल जैसे बाहरी पदार्थ पाए जाने की शिकायतें भी सामने आने की बात कही जा रही है। इस संबंध में उठाए जा रहे सवालों के बीच यह मांग जोर पकड़ रही है कि कोयले की गुणवत्ता, नमूनों की जांच और आपूर्ति प्रक्रिया की स्वतंत्र रूप से पड़ताल की जाए। यदि शिकायतों की पुष्टि होती है, तो बिजली उत्पादन पर पड़ने वाले संभावित तकनीकी प्रभाव और अन्य वित्तीय परिणामों का भी आकलन किया जाना चाहिए।
उपलब्ध बाजार दरों और गणना के मुताबिक, यदि ‘ग्रेड-10’ और ‘ग्रेड-15’ के बीच लगभग प्रति टन औसतन रु 4500 से रु 5500 का मूल्य अंतर माना जाए, आर्थिक जानकारों का अनुमान है कि यदि ग्रेड के इस हेरफेर की बात सच पाई जाती है और यह लाखों टन की आपूर्ति में हुआ है, तो इससे सरकारी खजाने को अरबों-खरबों रुपये का संभावित वित्तीय घाटा पहुँच सकता है कागजों पर अच्छे ग्रेड का भुगतान सरकारी तिजोरी से किया जा रहा है, जबकि बदले में घटिया कोयला और कचरा मिलने की बात कही जा रही है?
लोडिंग पॉइंट से लेकर डेस्टिनेशन पॉइंट तक थर्ड-पार्टी सैंपलिंग और जॉइंट सैंपलिंग की व्यवस्था होने के बावजूद यदि इस स्तर पर विसंगतियां सामने आ रही हैं, तो इससे संबंधित अधिकारियों और निगरानी तंत्र की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं। हालांकि, अभी तक किसी अधिकारी की सीधी संलिप्तता की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन जानकारों का मानना है कि यदि पारदर्शी जांच हो, तो कई परतें उधड़ सकती हैं।
ऐसे में यह सवाल उठता है कि क्या खदान से भेजे गए कोयले की गुणवत्ता और बिजलीघर में प्राप्त कोयले की गुणवत्ता के बीच कोई वास्तविक अंतर है? यदि अंतर है, तो उसके कारण क्या हैं और संबंधित शिकायतों पर अब तक क्या कार्रवाई हुई है? मामले की गंभीरता को देखते हुए स्वतंत्र एवं निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच की मांग की जा रही है, ताकि तथ्यों के आधार पर जिम्मेदारी तय हो सके और किसी भी अनियमितता की पुष्टि होने पर नियमानुसार कार्रवाई की जा सके।
शिव शंभू सिंह ने RTI के जरिए मांगी जानकारी
मामले की गंभीरता को देखते हुए आरटीआई (RTI) एक्टिविस्ट शिव शंभू सिंह द्वारा सूचना का अधिकार अधिनियम के तहत कोयला आपूर्ति, वैगनवार विवरण और लैब रिपोर्ट से जुड़े दस्तावेज मांगे गए हैं। इस खुलासे के बाद अब विभिन्न हलकों से मांग उठने लगी है कि:
1. पूरे मामले की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष उच्चस्तरीय जांच कराई जाए।
2. खदान के लोडिंग स्थल और पावर प्लांट के प्राप्ति स्थल की GCV रिपोर्ट का मिलान किया जाए।
3. ट्रांसपोर्टेशन, वेइब्रिज और सैंपलिंग प्रक्रिया से जुड़े रिकॉर्ड खंगाले जाएं ताकि दोषियों पर कड़ी कार्रवाई हो सके।
प्रशासन के सामने पांच बड़े सवाल
खदान से भेजे गए और बिजलीघर में प्राप्त कोयले की गुणवत्ता में कितना अंतर है?
क्या नमूना संग्रह और प्रयोगशाला जांच की प्रक्रिया सही तरीके से हुई?
शिकायतों पर क्या कार्रवाई की गई?
संभावित आर्थिक नुकसान कितना है और इसकी जिम्मेदारी किसकी बनती है?
यदि अनियमितता प्रमाणित होती है, तो जवाबदेही कब तय होगी?
शिकायतें हुईं तो कार्रवाई कहां है?
सूत्रों के अनुसार, इस विषय पर लगातार शिकायतें किए जाने की बात सामने आ रही है। अब यह स्पष्ट होना चाहिए कि शिकायतें किन अधिकारियों के पास पहुंचीं, उनकी जांच हुई या नहीं और क्या कार्रवाई की गई। मामले में संबंधित अधिकारियों की भूमिका को लेकर भी चर्चाएं हैं। हालांकि, किसी अधिकारी की मिलीभगत या भ्रष्टाचार की पुष्टि उपलब्ध दस्तावेजों से नहीं हुई है। इसलिए स्वतंत्र जांच और रिकॉर्ड का सत्यापन बेहद जरूरी है।








