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आदिवासी क्षेत्रों के किसान मल्चिंग खेती की ओर अग्रेसर

– आधुनिक तकनीक के उपयोग से जल की बचत, उत्पादन में वृद्धि।

सचिन चौरसिया, रामटेक :- पारंपरिक कृषि प्रणाली में केवल कड़ी मेहनत ही मायने रखती है| किसानों को उत्पादन में कमी ही देखने को मिलती है। कड़ी मेहनत के मुकाबले उत्पादन कम हो रहा है और खर्च भी बढ़ रहा है। हालांकि, समय के साथ-साथ बड़े बदलाव आ रहे हैं। खरपतवारों को फसल के साथ उगने से रोकने और बीमारियों को फैलने से बचाने के लिए फसलों पर मल्चिंग पेपर का प्रयोग आज कृषि क्षेत्र में वरदान साबित हो रहा है। ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों के किसान अब पारंपरिक कृषि विधियों को आधुनिक तकनीक के साथ मिलाकर मल्चिंग कृषि की ओर रुख कर रहे हैं। यह देखा जा रहा है कि किसान पानी की कमी, बढ़ती उत्पादन लागत और बदलते मौसम की स्थिति से निपटने के लिए प्लास्टिक मल्चिंग तकनीक को अपना रहे हैं। मल्चिंग विधि में फसलों के ऊपर एक विशेष प्लास्टिक कवर लगाया जाता है। इससे मिट्टी में नमी लंबे समय तक बनी रहती है, खरपतवारों की वृद्धि कम होती है और सिंचाई के लिए पानी की बचत होती है। साथ ही फसलों को उचित तापमान मिलने से उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों में वृद्धि होती है। देवलापार क्षेत्र के कई किसान टमाटर, मिर्च, बैंगन, भिंडी और विभिन्न सब्जियों की फसलों के लिए मल्चिंग का उपयोग कर रहे हैं। ड्रिप सिंचाई के साथ मल्चिंग का उपयोग करने से कम पानी में अधिक उत्पादन संभव हो पाता है। किसानों का मानना है कि इससे खेती अधिक लाभदायक हो जाती है। कृषि विभाग विभिन्न योजनाओं के तहत मल्चिंग के लिए सब्सिडी भी प्रदान कर रहा है। इसलिए, छोटे भूस्वामी और आदिवासी किसान भी इस आधुनिक तकनीक को अपना रहे हैं। मल्चिंग खेती को कृषि लागत कम करने और उत्पादन बढ़ाने के एक प्रभावी विकल्प के रूप में देखा जा रहा है, और ग्रामीण क्षेत्रों में इस पद्धति का प्रसार बढ़ रहा है। आधुनिक तकनीक को अपनाकर आदिवासी क्षेत्रों के किसान आत्मनिर्भरता की ओर बढ़ रहे हैं, और मल्चिंग खेती उनकी आर्थिक प्रगति को एक नई दिशा दे रही है।

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