– नागपुर में कांग्रेस का डमी उम्मीदवार पीछे हटा
नागपुर :- नागपुर स्थानीय स्व-शासन निर्वाचन क्षेत्र के लिए विधान परिषद उपचुनाव को लेकर बना सस्पेंस जो कांग्रेस के दो उम्मीदवारों के मैदान में उतरने से पैदा हुआ था, आखिरकार खत्म हो गया है. दिनेश ढोले के अपने नामांकन पत्र वापस लेने के बाद, अब भाजपा के डॉ. राजीव पोतदार और कांग्रेस के अतुल लोंढे के बीच सीधा चुनावी मुकाबला होगा.
नागपुर स्थानीय स्व-शासन निर्वाचन क्षेत्र की सीट तब खाली हो गई थी, जब भाजपा के वरिष्ठ नेता चंद्रशेखर बावनकुले ने विधानसभा चुनावों में जीत के बाद विधान परिषद की अपनी सदस्यता से इस्तीफा दे दिया था. चुनाव आयोग ने इस खाली सीट को भरने के लिए उपचुनाव की घोषणा की है. इस चुनाव के लिए, भाजपा ने पूर्व जिला अध्यक्ष डॉ. राजीव पोतदार को अपना उम्मीदवार बनाया है. हालांकि, स्थानीय स्व-शासन निकायों में अपनी संख्या बल को देखते हुए भजपा को मजबूत स्थिति में माना जा रहा है, लेकिन कांग्रेस पार्टी ने इस चुनाव को केवल एक औपचारिकता न मानकर, इसे प्रतिष्ठा का मुकाबला बनाने का फैसला किया है.
कांग्रेस के दो प्रतिनिधियों—प्रदेश प्रवक्ता अतुल लोंढे और पूर्व जिला परिषद सदस्य दिनेश ढोले द्वारा नामांकन पत्र दाखिल किए जाने से राजनीतिक गलियारों में पार्टी के आंतरिक तालमेल और चुनावी रणनीति को लेकर गहन चर्चाएं शुरू हो गई थीं. चूंकि ‘बीफॉर्म’ (आधिकारिक अनुमति पत्र) पर सबसे पहले अतुल लोंढे का नाम था, इसलिए शुरू से ही यह व्यापक रूप से माना जा रहा था कि वही पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार होंगे. हालांकि, दो अलग-अलग आवेदन जमा होने से कुछ समय के लिए भ्रम की स्थिति पैदा हो गई थी. इन घटनाक्रमों ने राजनीतिक विश्लेषकों का ध्यान भी अपनी ओर खींचा, जिन्होंने कांग्रेस पार्टी की चुनावी रणनीति और आंतरिक एकजुटता पर अपनी पैनी नजर रखी.
नामांकन पत्र वापस लेने के लिए निर्धारित अंतिम दिन, दिनेश ढोले ने औपचारिक रूप से अपना आवेदन वापस ले लिया. परिणामस्वरूप, अतुल लोंढे को कांग्रेस पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवार के रूप में पुष्टि मिल गई है. अब भाजपा के डॉ. राजीव पोतदार और कांग्रेस के अतुल लोंढे के बीच सीधा चुनावी मुकाबला तय हो गया है. भाजपा की संख्या बल में मजबूती के बावजूद, कांग्रेस के लिए यह प्रतिष्ठा की लड़ाई बनी हुई है.
बीजेपी जीत हासिल करने की तैयारी में जुटी
इस निर्वाचन क्षेत्र में, नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के लगभग 836 निर्वाचित प्रतिनिधि अपने वोट डालेंगे. इस संख्या बल के आधार पर, बीजेपी का पलड़ा भारी माना जा रहा है. फिर भी, कांग्रेस पार्टी ने इसे प्रतिष्ठा की लड़ाई बना लिया है और एक राजनीतिक संदेश देने के प्रयास में, उसने इस चुनाव को निर्विरोध नहीं होने दिया है. कांग्रेस का लक्ष्य यह दिखाना है कि स्थानीय स्व-शासन निकायों के भीतर उसका प्रभाव अभी भी बरकरार है. दूसरी ओर, बीजेपी भी अपनी संगठनात्मक शक्ति और स्थानीय नेटवर्क का लाभ उठाकर जीत हासिल करने की तैयारी में जुटी है.








