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एकजुट है भारत, नफरत छोड़कर अपनाएं मानवता का मार्ग

– गोस्वामी सुशील महाराज के वक्तव्य, ताजबाग में ‘सूफी इंटरफेथ कॉन्फ्रेंस’ का भव्य आयोजन

नागपुर :- हजरत बाबा ताजुद्दीन ट्रस्ट के तत्वावधान में ताजबाग में बाबा ताजुद्दीन रहमतुल्लाह अलैह के 104वें सालाना उर्स के आगाज अवसर पर ‘सूफी इंटरफेथ कॉन्फ्रेंस’ का सफल आयोजन किया गया. इस कॉन्फ्रेंस में विभिन्न धर्मों के शीर्ष धर्मगुरुओं ने शिरकत कर समाज को एकता, आपसी प्रेम और भाईचारे का संदेश दिया. इसमें भारतीय सर्वधर्म संसद के राष्ट्रीय संयोजक और महर्षि भृगु पीठाधीश्वर गुरु गोस्वामी सुशील महाराज, मुस्लिम धर्मगुरु मौलाना सैयद आले मुस्तफा कादरी मूसावी, अजमेर दरगाह के गद्दीनशीन सैयद सलमान चिश्ती, स्वामी वीर सिंह हितकारी महाराज, दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी के मुख्य सलाहकार सरदार परमजीत सिंह चंडोक, भारत तिब्बत सहयोग मंच के आचार्य येशी फुनतसोक और आचार्य विवेक मुनि महाराज शामिल हुए. कार्यक्रम में हजरत बाबा ताजुद्दीन ट्रस्ट के चेयरमैन प्यारे जिया खान, उपाध्यक्ष डॉ. सुरेंद्र जिचकार, सचिव ताज अहमद राजा, ट्रस्टी हाजी फारुख बावला, मुस्तफाभाई टोपीवाला, हाजी इमरान खान ताजी और गजेंद्रपाल सिंह लोहिया प्रमुखता से उपस्थित थे. कार्यक्रम की प्रस्तावना सचिव ताज अहमद राजा ने रखी. मंच संचालन गयासुद्दीन अशरफी ने किया.

इस दौरान उपस्थितों को संबोधित करते हुए भारतीय सर्वधर्म संसद के राष्ट्रीय संयोजक और महर्षि भृगु पीठाधीश्वर गुरु गोस्वामी सुशील महाराज ने कहा कि भारत एक ऐसा देश है, जहां दुनिया के अलग-अलग मजहबों को मानने वाले लोग रहने के बाद भी एकजुट रहते हैं. हाल ही में हुए जी-20 सम्मेलन का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा कि दिल्ली में तीन दिनों तक पूरी दुनिया से आए लोगों के बीच शांति और सौहार्द का पैगाम दिया गया, जो यह साबित करता है कि ‘सर्वे भवंतु सुखिनः’ के सिद्धांत के तहत दुनिया के सभी मानव हमारे हैं. उन्होंने इतिहास का हवाला देते हुए कहा कि इस देश में आर्य, शक, हूण, पारसी और अरबी जैसी कई संस्कृतियां आईं और आपस में मिल गईं, लेकिन हमारी मूल संस्कृति को कोई मिटा नहीं सका. उन्होंने सरहदों और तारों के खिंचने से बने देशों पर बात करते हुए कहा कि मूल रूप से यह दुनिया एक ही थी और अब समय आ गया है कि देश को लगी नफरत की नजर को उतारा जाए. इंटरफेथ कॉन्फ्रेंस की जरूरत पर जोर देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि अगर सभी मजहबों के लोग साथ बैठकर यह तय कर लें कि वे किसी दूसरे के धर्म को नीचा नहीं दिखाएंगे, तो नफरत के बीज अपने आप खत्म हो जाएंगे। दुनिया में चल रहे युद्धों और धर्मगुरुओं पर हो रहे हमलों की निंदा करते हुए उन्होंने कहा कि बुद्ध को मानने वाला कभी युद्ध का हिमायती नहीं हो सकता और हर युग में हुए युद्धों के भी कुछ नियम होने चाहिए. उन्होंने अंत में नफरत छोड़कर एक-दूसरे को गले लगाने की अपील की और कहा कि आखिर में जीत हमेशा प्रेम और मानवता की ही होती है.

गरीब नवाज ने सर्वधर्म सम्मान में लंगर से हटाया था गोश्त

मौलाना सैयद आले मुस्तफा कादरी मूसावी ने सूफीवाद और सर्वधर्म समभाव का संदेश देते हुए कहा कि आज दुनिया में जहाँ एक तरफ आतंकवाद है, वहीं दूसरी तरफ सूफीवाद है जो हमेशा मोहब्बत का पैगाम देता है. उन्होंने हजरत गरीब नवाज को याद करते हुए बताया कि जब वे ८०० साल पहले हिंदुस्तान आए थे, तो उनके पास कोई सेना या हथियार नहीं था, बल्कि वे केवल पैगंबर साहब के अखलाक, इंसानियत से प्यार और रूहानी तड़प लेकर आए थे. उनकी इसी मोहब्बत की ताकत के आगे शहंशाह अकबर को भी अपनी चप्पलें उतारकर, नंगे पैर उनके आस्ताने पर सिर झुकाना पड़ा था, क्योंकि जो काम तलवार की ताकत नहीं कर सकी, उसे प्यार ने कर दिखाया. उन्होंने कहा कि इस्लाम को सही मायनों, सही रूप और रंग में पेश करने वाली जात गरीब नवाज की है, जिन्होंने हिंदुस्तान की सरजमीं पर आकर सबसे पहले भेदभाव को मिटाया. मौलाना ने धार्मिक निष्ठा पर जोर देते हुए कहा कि मजहब पार्ट-टाइम नहीं बल्कि फुल-टाइम होना चाहिए और इंसान जितना ज्यादा धार्मिक होगा, वह उतना ही बड़ा इंसान बनेगा तथा उसके दिल में इंसानियत के लिए उतनी ही तड़प होगी. गरीब नवाज की सहनशीलता और त्याग का उदाहरण देते हुए उन्होंने कहा कि जब मुरीदों ने बताया कि हिंदुस्तान के कुछ हिंदू भाई गोश्त (मांस) नहीं खाते, तो गरीब नवाज ने अपने लंगर में गोश्त पकाना हमेशा के लिए बंद करवा दिया. अंत में उन्होंने सिख समाज की उपस्थिति का सम्मान करते हुए यह भी उल्लेख किया कि खुद गुरु नानक देव जी जब बगदाद गए थे, तो उन्होंने शेख अब्दुल कादिर जिलानी की खानकाह की लंगर व्यवस्था से प्रभावित होकर ही लंगर के विचार (कॉन्सेप्ट) को अपनाया था, जो यह साबित करता है कि यह प्यार, त्याग और भक्ति किसी एक की जागीर नहीं बल्कि पूरे समाज के कल्याण के लिए है.

अजमेर शरीफ दरगाह के गद्दीनशीन सैयद सलमान चिश्ती ने सूफियों और संतों के पैगाम को पूरी इंसानियत के लिए जरूरी बताया। उन्होंने कौमी एकता की मिसाल देते हुए कहा कि हजरत बाबा फरीदुद्दीन की खानकाह में गोरखनाथ मठ के योगी और सूफी कलंदर साथ बैठकर अध्यात्म और योगिक क्रियाएं सीखा करते थे। चिश्ती परंपरा का मूल मंत्र है- “मज़हब और ज़ात पूछे बिना सबसे मोहब्बत और किसी से नफ़रत नहीं।” जैसे सूरज, नदियां और मातृभूमि कभी किसी का मजहब नहीं पूछते, वैसे ही इन आस्तानों पर सिर्फ सेवा की भावना सर्वोपरि होती है। पवित्र कुरान की आयत ‘अल-खल्क उयालुल्लाह’ (ईश्वर का कुनबा) और भारतीय अध्यात्म का ‘वसुधैव कुटुंबकम्’ एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।

स्वामी वीर सिंह हितकारी महाराज

स्वामी वीर सिंह हितकारी महाराज ने कहा कि बाबा ताजुद्दीन औलिया ने नागपुर की ऐतिहासिक धरती से मोहब्बत और इंसानियत का जो संदेश दिया है, आज पूरा देश उसे नमन कर रहा है। संत कबीर और संत रविदास की वाणियों को याद करते हुए उन्होंने कहा कि इस संसार को बनाने वाले मालिक की दुनिया और उसके इंसानों से प्रेम करना ही सबसे सच्ची इबादत है; नेकी और मानव प्रेम ही सबसे बड़ा धर्म है। सूफी आस्तानों की रूहानियत हमेशा दिलों को जोड़ने, नफरत को मिटाने और दुनिया के सताए हुए लोगों को सीने से लगाने का पैगाम देती है।

सरदार परमजीत सिंह चंडोक

सरदार परमजीत सिंह चंडोक ने सांप्रदायिक सौहार्द पर बल देते हुए कहा कि मजहब आपस में बैर रखना नहीं सिखाता। गुरु नानक देव जी का मानवतावादी संदेश आज भी पूरी दुनिया के लिए प्रासंगिक है। उन्होंने श्री गुरु ग्रंथ साहिब को सर्वधर्म समभाव का अनूठा प्रतीक बताया, जिसमें सिख गुरुओं के साथ-साथ विभिन्न मतों के संतों व पीरों की पवित्र वाणी भी दर्ज है। गुरु नानक देव जी ने ४०,००० किलोमीटर की यात्रा कर आपसी भाईचारे का पैगाम दिया था, जिसे आत्मसात करते हुए वे खुद भी मंदिर, मस्जिद, दरगाह और चर्च सब जगह जाते हैं और सभी ग्रंथों का सम्मान करते हैं।

आचार्य येशी फुनतसोक

भारत तिब्बत सहयोग मंच के आचार्य येशी फुनतसोक ने समाज को इंसानियत और अहिंसा का संदेश देते हुए कहा कि आज के कलयुग में ‘मैं और मेरा’ की स्वार्थी सोच हावी हो गई है, जिससे ‘हम और हमारे’ की भावना खत्म हो रही है। तथागत बुद्ध के संदेशों का संदर्भ देते हुए उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म हमें प्रेम, करुणा और परोपकार सिखाता है; इसलिए जीवन में पाप का त्याग कर पुण्य कमाना चाहिए। सभी धर्मों का अंतिम दृष्टिकोण एक ही है कि इंसानियत ही सर्वोपरि है और अहिंसा संसार के सभी जीवों के लिए होनी चाहिए। प्रत्येक व्यक्ति को अपने धर्म का पालन करते हुए दूसरों के धर्म का आदर करना चाहिए.

आचार्य विवेक मुनि महाराज

आचार्य विवेक मुनि महाराज ने कहा कि यह आयोजन मोहब्बत, भाईचारे और इंसानियत की सेवा तथा उनके उत्थान व विकास के लिए विशेष रूप से रखा गया है। संसार में आए सभी अवतारों, तीर्थंकरों, पैगंबरों, संतों, सूफियों और योगियों ने इस जगत को सर्वधर्म सद्भाव और विश्व बंधुत्व का ही संदेश दिया है। संतों और महापुरुषों का जीवन परमार्थ तथा मानवता के कल्याण के लिए होता है। सभी मनुष्य उसी ईश्वर की संतान हैं और धर्म के साथ-साथ आज समाज में सेवा, शिक्षा और चिकित्सा का कार्य होना बेहद जरूरी है, क्योंकि मानव धर्म से बढ़कर ‘सेवा परमो धर्म’ ही सबसे बड़ा धर्म है.

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