– मरीज परेशान, डॉक्टर गायब, व्यवस्था लाचार!
– “गरीब आखिर जाए तो जाए कहां?”
सावनेर | विशेष रिपोर्ट :- सावनेर का सरकारी अस्पताल कभी किसानों, मजदूरों और आम जनता की सबसे बड़ी उम्मीद माना जाता था। गौरतलब है कि क्षेत्र के वर्तमान विधायक आशिष देशमुख सहित पूर्व जनप्रतिनिधियों द्वारा भी अस्पताल के विकास को लेकर समय-समय पर कई प्रयास किए गए हैं। लेकिन आज यही अस्पताल सवालों के घेरे में है। स्थानीय नागरिकों, मरीजों और उनके परिजनों के बीच लगातार यह चर्चा बढ़ती जा रही है कि आखिर सरकारी अस्पताल की व्यवस्थाएं इतनी बदहाल क्यों होती जा रही हैं? जमीनी स्तर पर मरीजों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है तो संबंधित विभागों को इसकी गंभीरता से जांच करनी चाहिए।
रोजमर्रा की जिंदगी में किसान, मजदूर और आम नागरिकों को सुबह जल्दी अपने काम पर निकलना पड़ता है। ऐसे में वे उम्मीद लेकर सरकारी अस्पताल पहुंचते हैं कि समय पर इलाज करवाकर अपने काम पर जा सकेंगे। लेकिन मरीजों का आरोप है कि सुबह निर्धारित समय पर अस्पताल पहुंचने के बावजूद उन्हें घंटों डॉक्टरों का इंतजार करना पड़ता है। कई लोगों का कहना है कि सुबह 8 बजे से 8:30 बजे के बीच अस्पताल पहुंचने पर अक्सर डॉक्टर और संबंधित स्टाफ उपलब्ध नहीं मिलते, जिसके कारण उन्हें 10.30 बजे या उससे भी अधिक समय तक इंतजार करना पड़ता है। इसका सीधा असर उनकी रोजी-रोटी पर पड़ता है, क्योंकि इलाज के इंतजार में उनका पूरा दिन खराब हो जाता है और कई मजदूरों तथा किसानों को अपनी एक दिन की मजदूरी तक गंवानी पड़ती है।
सबसे ज्यादा परेशानी मधुमेह (शुगर) के मरीजों को बताई जा रही है। मरीजों का कहना है कि समय पर डॉक्टर उपलब्ध न होने से फास्टिंग और पोस्ट-मील जांच की प्रक्रिया प्रभावित होती है और उन्हें अनावश्यक परेशानियों का सामना करना पड़ता है।
स्थानीय लोगों के बीच यह भी चर्चा है कि अस्पताल में नियुक्त कुछ डॉक्टर मुख्यालय पर रहने के बजाय प्रतिदिन नागपुर से आना-जाना करते हैं। नागरिकों का कहना है कि यदि डॉक्टरों के लिए मुख्यालय पर रहना अनिवार्य है तो इसकी जांच होनी चाहिए। लोगों का आरोप है कि रोजाना लंबी दूरी तय करने के कारण समय पर सेवाएं प्रभावित हो रही हैं।
अस्पताल में आधुनिक तकनीक उपलब्ध होने के बावजूद उपस्थिति को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। नागरिक पूछ रहे हैं कि जब बायोमेट्रिक जैसी व्यवस्था उपलब्ध है तो फिर केवल रजिस्टरों पर निर्भरता क्यों बनी हुई है? आखिर उपस्थिति की पारदर्शी निगरानी क्यों नहीं हो रही?
मरीजों और उनके परिजनों का यह भी कहना है कि अस्पताल में मूलभूत सुविधाओं की स्थिति संतोषजनक नहीं है। शौचालय व्यवस्था से लेकर मरीजों के साथ व्यवहार तक कई शिकायतें सामने आ रही हैं। कुछ लोगों का आरोप है कि सरकारी अस्पताल में आने वाले गरीब और ग्रामीण मरीजों के साथ कई बार सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया जाता।
इसी बीच अस्पताल प्रशासन की कार्यशैली को लेकर भी चर्चाएं तेज हैं कुछ इंटर्न डॉक्टरों द्वारा शिकायत किए जाने की बातें भी सामने आ रही हैं, हालांकि इनकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। लेकिन इन चर्चाओं ने अस्पताल परिसर और स्थानीय स्तर पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि करोड़ों रुपये खर्च कर अस्पतालों में नई सुविधाओं का उद्घाटन किया जाता है, ट्रॉमा सेंटर बनाए जाते हैं, नई योजनाओं की घोषणाएं होती हैं, लेकिन यदि मरीजों को समय पर डॉक्टर और उचित सेवाएं नहीं मिल रही हैं तो आखिर इन सुविधाओं का लाभ किसे मिल रहा है?
अब क्षेत्र में एक और गंभीर चर्चा जोर पकड़ रही है। कुछ नागरिक सवाल उठा रहे हैं कि क्या सरकारी अस्पताल की लगातार बिगड़ती व्यवस्था के पीछे कोई बड़ी वजह है? क्या लापरवाही और अव्यवस्था के कारण गरीब, किसान और मजदूर वर्ग के मरीज मजबूर होकर निजी अस्पतालों की ओर रुख कर रहे हैं? क्या यह केवल संयोग है या इसके पीछे कोई और कारण है? लेकिन जनता के बीच उठ रहे ये सवाल प्रशासन के लिए चिंता का विषय जरूर हैं।
आज सावनेर की जनता एक ही सवाल पूछ रही है आखिर गरीब आदमी जाए तो जाए कहां? सरकारी अस्पताल में समय पर सेवा नहीं, निजी अस्पतालों का खर्च उठाना मुश्किल। ऐसे में सबसे अधिक परेशान वही वर्ग हो रहा है जिसके लिए सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था बनाई गई थी।
जनता की मांग है कि जिला स्वास्थ्य प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और संबंधित अधिकारी अस्पताल की कार्यप्रणाली की निष्पक्ष जांच करें, डॉक्टरों की उपस्थिति, मरीजों की सुविधाओं और प्रशासनिक व्यवस्था का ऑडिट करें तथा दोषी पाए जाने वालों पर कार्रवाई करें। क्योंकि यह केवल एक अस्पताल का मामला नहीं, बल्कि हजारों गरीब परिवारों के स्वास्थ्य और विश्वास का प्रश्न है।








