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सावनेर नगर परिषद में महाघोटाले के आरोप, क्या सरकार ने डाला पर्दा?

नागपुर/सावनेर :- हाल ही में संपन्न हुए नगर परिषद के आम चुनावों के बाद खर्चों को लेकर गंभीर विवाद खड़ा हो गया है। चुनावी माहौल की चर्चा के बीच कथित आर्थिक अनियमितताओं ने प्रशासन और राजनीतिक हलकों में हलचल मचा दी है। सावनेर में नगर परिषद चुनाव के नाम पर सामने आए इस कथित आर्थिक घोटाले ने प्रशासनिक व्यवस्था की साख पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। एक ओर करोड़ों रुपये के खर्च में भारी अनियमितताओं के आरोप हैं, तो दूसरी ओर सरकार और संबंधित विभागों की चुप्पी संदेह को और गहरा कर रही है।

पूर्व नगरसेवक सुनील चापेकर ने सूचना के अधिकार (RTI) के माध्यम से प्राप्त दस्तावेजों के आधार पर नगर परिषद प्रशासन पर बड़े पैमाने पर घोटाले के आरोप लगाए हैं। उनका दावा है कि चुनावी खर्च के नाम पर सरकारी खजाने से लगभग एक करोड़ रुपये निकाले गए, जिनमें भारी गड़बड़ी की गई है।

चापेकर के अनुसार, चुनाव सामग्री, पंडाल सजावट, सीसीटीवी कैमरे, स्टेशनरी, भोजन और अन्य व्यवस्थाओं के लिए बनाए गए बिल बाजार दर से कई गुना अधिक हैं। उदाहरण के तौर पर, 20×10 फीट के बैनर का बिल 20,000 रुपये दिखाया गया, जबकि बाजार में इसकी कीमत 1,700 से 3,400 रुपये के बीच होती है। इसी तरह 20 लीटर पानी की कैन, जो सामान्यतः 25–30 रुपये में उपलब्ध होती है, इसके बावजूद 78 रुपये प्रति कैन के हिसाब से खरीदा दिखाया गया है।

भोजन व्यवस्था को लेकर भी गंभीर सवाल उठाए गए हैं। आरोप है कि 767 लोगों के नाश्ते और 1,250 लोगों के भोजन सहित अन्य खाद्य व्यवस्थाओं का भारी खर्च दर्शाया गया, जबकि वास्तविकता इससे अलग बताई जा रही है।

पूर्व नगरसेवक सुनील चापेकर का आरोप है कि कर्मचारियों को केवल साधारण भोजन जैसे एक दिन आलू-भात और दूसरे दिन रोटी, सब्जी, चावल व दाल ही उपलब्ध कराया गया। उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि कुछ बाहरी कर्मचारियों से बातचीत में यही जानकारी सामने आई, जिससे बिलों में दर्शाए गए खर्च पर संदेह और गहरा हो गया है। चापेकर ने मांग की है कि जिन लोगों के नाम पर भोजन का खर्च दिखाया गया है, उनकी सूची सार्वजनिक की जाए, ताकि यह स्पष्ट हो सके कि वास्तव में इतने लोगों को भोजन कराया गया था या नहीं।

प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, पंडाल डेकोरेशन पर 14.75 लाख रुपये, सीसीटीवी एवं रिकॉर्डिंग पर 12.15 लाख रुपये, स्टेशनरी पर 6.43 लाख रुपये और भोजन पर 5.20 लाख रुपये खर्च दिखाया गया है। इसके अलावा पानी, चाय-कॉफी, स्नैक्स और अन्य मदों में भी लाखों रुपये खर्च दर्शाए गए हैं। कुल मिलाकर चुनावी अवधि में लगभग एक करोड़ रुपये के खर्च पर सवाल उठाए गए हैं।

चापेकर ने यह भी आरोप लगाया कि यदि उन्होंने RTI के तहत जानकारी न मांगी होती, तो यह मामला दबा दिया जाता। उन्होंने इस पूरे प्रकरण की विशेष ऑडिट कराने और एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) से जांच कराने की मांग की है। इसके लिए उन्होंने मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस सहित संबंधित विभागों को शिकायत भेजी है।

इस मामले ने स्थानीय राजनीति में भी हलचल पैदा कर दी है। क्षेत्रीय विधायक आशीष देशमुख की कार्यशैली की सराहना के बीच प्रशासनिक स्तर पर उठे ये सवाल सरकार की छवि पर भी प्रभाव डाल सकते हैं।अब देखना यह होगा कि क्या सरकार इस पर स्वतंत्र जांच या विशेष ऑडिट कराती है या नहीं। यदि जांच होती है, तो ही सच्चाई सामने आ सकेगी।

RTI से खुला मामला

इस पूरे मामले में अहम बात यह सामने आई है कि यदि पूर्व नगरसेवक सुनील चापेकर ने RTI के माध्यम से जानकारी प्राप्त नहीं की होती, तो यह मामला सामने नहीं आता। इससे पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए सूचना के अधिकार की भूमिका एक बार फिर महत्वपूर्ण साबित हुई है।

जनविश्वास बनाम प्रशासनिक सवाल

क्षेत्रीय विधायक आशीष देशमुख की कार्यशैली की सराहना के बीच प्रशासनिक स्तर पर उठ रहे ये गंभीर सवाल अब सीधे तौर पर सरकार की छवि को प्रभावित करने लगे हैं। “ना खाऊंगा, ना खाने दूंगा” जैसे सशक्त नारे के साथ जनता का विश्वास जीतने वाले विधायक से अब अपेक्षा और भी बढ़ गई है कि वे इन आरोपों को नजरअंदाज करने के बजाय तत्काल और कड़ी कार्रवाई करें।

वर्तमान स्थिति यह संकेत दे रही है कि उनके ही कार्यकाल में कुछ अधिकारियों द्वारा नगर परिषद को आर्थिक नुकसान पहुंचाने के आरोप सामने आ रहे हैं। ऐसे में यह जरूरी हो जाता है कि वे स्वयं आगे आकर इस पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग करें और संबंधित अधिकारियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई सुनिश्चित करें।

अब समय आ गया है कि आशीष देशमुख इस मुद्दे पर स्पष्ट और कठोर रुख अपनाते हुए तुरंत हस्तक्षेप करें। यदि उन्होंने स्वयं पहल कर एसीबी जांच या विशेष ऑडिट की मांग नहीं की, तो यह सवाल उठना लाजमी होगा कि आखिरकार इस पूरे मामले पर चुप्पी क्यों साधी जा रही है।

जनता अब केवल आश्वासन नहीं, बल्कि ठोस कार्रवाई देखना चाहती है। ऐसे में यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो यह न केवल प्रशासनिक व्यवस्था पर बल्कि उनके नेतृत्व और विश्वसनीयता पर भी गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर सकता है।

पूर्व रिकॉर्ड पर भी उठे सवाल

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी तेज है कि संबंधित अधिकारी जहां-जहां पहले पदस्थ रहे, वहां भी उनके कामकाज को लेकर विवाद सामने आए हैं। अब वही पैटर्न सावनेर में दोहराए जाने की आशंका जताई जा रही है, जिससे पूरे मामले की निष्पक्ष जांच की मांग और मजबूत हो गई है।

सरकार की जवाबदेही पर सवाल ; जांच की मांग तेज

निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है कि संबंधित अधिकारियों को तत्काल प्रभाव से उनके पद से हटाया जाए और स्वतंत्र एजेंसी के माध्यम से जांच शुरू की जाए, ताकि किसी भी प्रकार के दबाव या प्रभाव के बिना सच्चाई सामने आ सके।

सरकार की जिम्मेदारी केवल बयान देने तक सीमित नहीं रह सकती। मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और शहरी विकास विभाग को इस पूरे मामले में तत्काल हस्तक्षेप करते हुए स्वतंत्र और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करनी चाहिए। यदि समय रहते ठोस कार्रवाई नहीं की गई, तो यह संदेश जाएगा कि सरकार भ्रष्टाचार पर पर्दा डालने का प्रयास कर रही है।

  • मौजूदा परिस्थितियों को देखते हुए आवश्यक है कि प्रकरण को गंभीरता से लेते हुए एंटी करप्शन ब्यूरो (ACB) को सौंपकर जांच तत्काल शुरू की जाए। जानकारों का मानना है कि यदि समय पर कार्रवाई नहीं हुई, तो इस प्रकार की अनियमितताएं न केवल सरकारी खजाने को नुकसान पहुंचाती रहेगी, बल्कि इससे सरकार की छवि पर भी नकारात्मक प्रभाव पडेगा.

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